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Rigveda / 5 / 52 / 12

छ॒न्दः॒स्तुभः॑ कुभ॒न्यव॒ उत्स॒मा की॒रिणो॑ नृतुः। ते मे॒ के चि॒न्न ता॒यव॒ ऊमा॑ आसन्दृ॒शि त्वि॒षे ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 52 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्य कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : छ॒न्दः॒स्तुभः॑। कु॒भ॒न्यवः॑। उत्स॑म्। आ। की॒रिणः॑। नृ॒तुः॒ ते। मे॒। के। चि॒त्। न। ता॒यवः॑। ऊमाः॑। आ॒स॒न्। दृ॒शि॒। त्वि॒षे ॥१२॥

पदार्थ : जो (के) कोई (चित्) भी (छन्दःस्तुभः) छन्दों से स्तुति करनेवाले (उत्सम्) कूप के सदृश (कुभन्यवः) अपने को आर्द्रपन की इच्छा करते हुए (ऊमाः) सब के रक्षण आदि करनेवाले (दृशि) दर्शक में (मे) मेरे (त्विषे) शरीर और आत्मा के प्रकाश और बल के लिये (आसन्) होवें (ते) वे (नृतुः) नाचनेवाले के सदृश (आ) सब ओर से (कीरिणः) विक्षेप व्याकुल करनेवाले (तायवः) चोर जन (न) न होवें ॥१२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अन्य जनों के विक्षेप और चोरी न करके जैसे पिपासा से व्याकुल के लिये जल वैसे शान्ति के देनेवाले होकर सब के शरीर और आत्मा के बल को बढ़ाते हैं, वे ही श्रेष्ठ यथार्थवक्ता होते हैं ॥१२॥