Rigveda / 5 / 52 / 15
नू म॑न्वा॒न ए॑षां दे॒वाँ अच्छा॒ न व॒क्षणा॑। दा॒ना स॑चेत सू॒रिभि॒र्याम॑श्रुतेभिर॒ञ्जिभिः॑ ॥१५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 52 | Mantra No : 15
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : marutaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : nuu manvaana eShaa.m devaa.N achChaa na vakShaNaa. daanaa sacheta suuribhiryaamashrutebhira~njibhiH .15.
Component Words : nu. manvaanaH. eShaam. devaan. achCha. na. vakShaNaa. daanaa. sacheta. suuri.abhiH. yaama.ashrutebhiH. a~nji.abhiH .15.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर मनुष्य विद्वानों के सङ्ग से विद्याओं को प्राप्त हों, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : नु। म॒न्वा॒नः। ए॒षा॒म्। दे॒वान्। अच्छ॑। न। व॒क्षणा॑। दा॒ना। स॒चे॒त॒। सू॒रिऽभिः॑। याम॑ऽश्रुतेभिः। अ॒ञ्जिऽभिः॑ ॥१५॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (मन्वानः) मननशील पुरुष (यामश्रुतेभिः) याम प्रहर सुने गये जिनसे उन (अञ्जिभिः) विद्या और श्रेष्ठ गुणों के प्रकट करनेवाले (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (एषाम्) इन मनुष्यों के मध्य में (देवान्) श्रेष्ठ विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों को (अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त होता और (वक्षणा) प्रवाह से (दाना) दानों को करता है वह (नू) निश्चय दारिद्र्य और अज्ञान को (न) नहीं प्राप्त होता है, उसको आप लोग (सचेत) सम्बन्धित करिये ॥१५॥
भावार्थ : जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग को प्रिय मानने और विद्या के दान में रुचि करनेवाले होवें, वे ही शीघ्र विद्या को प्राप्त होवें ॥१५॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनर्मनुष्या विद्वत्सङ्गेन विद्याः प्राप्नुवन्त्वित्याह ॥
पदपाठ : नु। म॒न्वा॒नः। ए॒षा॒म्। दे॒वान्। अच्छ॑। न। व॒क्षणा॑। दा॒ना। स॒चे॒त॒। सू॒रिऽभिः॑। याम॑ऽश्रुतेभिः। अ॒ञ्जिऽभिः॑ ॥१५॥
पदार्थ : (नू) (मन्वानः) मननशीलः (एषाम्) मनुष्याणां मध्ये (देवान्) दिव्यान् विदुषः पदार्थान् वा (अच्छा) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (न) निषेधे (वक्षणा) वहनेन (दाना) दानानि (सचेत) सम्बध्नीत (सूरिभिः) विद्वद्भिः (यामश्रुतेभिः) यामाः श्रुता यैस्तैः (अञ्जिभिः) विद्याशुभगुणप्रकटकारकैः ॥१५॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यो मन्वानो यामश्रुतेभिरञ्जिभिः सूरिभिः सहैषां मध्ये देवानच्छाऽऽप्नोति वक्षणा दाना करोति स नू दारिद्र्यमज्ञानञ्च नाप्नोति तं यूयं सचेत ॥१५॥
भावार्थ : ये मनुष्या विद्वत्सङ्गप्रिया विद्यादानरुचयः स्युस्त एव सद्यो विद्यामाप्नुयुः ॥१५॥