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Rigveda / 1 / 34 / 12

आ नो॑ अश्विना त्रि॒वृता॒ रथे॑ना॒र्वाञ्चं॑ र॒यिं व॑हतं सु॒वीर॑म् । शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒मव॑से जोहवीमि वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 34 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर इनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : आ । नः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । त्रि॒ऽवृता॑ । रथे॑न । अ॒र्वाञ्च॑म् । र॒यिम् । व॒ह॒त॒म् । सु॒ऽवीर॑म् । शृ॒ण्वन्ता॑ । वा॒म् । अव॑से । जो॒ह॒वी॒मि॒ । वृ॒धे । च॒ । नः॒ । भ॒व॒त॒म् । वाज॑ऽसातौ॥

पदार्थ : हे कारीगरी में चतुरजनो (शृण्वन्ता) श्रवण करानेवाले (अश्विना) दृढ विद्या बल युक्त ! आप दोनों जल और पवन के समान (त्रिवृता) तीन अर्थात् स्थल जल और अन्तरिक्ष में पूर्णगति से जानेके लिये वर्त्तमान (रथेन) विमान आदि यान से (नः) हम लोगों को (अर्वाञ्चम्) ऊपर से नीचे अभीष्ट स्थान को प्राप्त होनेवाले (सुवीरम्) उत्तम वीर युक्त (रयिम्) चक्रवर्त्ति राज्य से सिद्ध हुए धन को (आवहतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होके पहुंचाइये (च) और (नः) हम लोगों के (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (वृधे) वृद्धि के अर्थ विजय को प्राप्त करानेवाले (भवतम्) हूजिये जैसे मैं (अवसे) रक्षादि के लिये तुम्हारा (जोहवीमि) वारंवार ग्रहण करता हूँ वैसे आप मुझको ग्रहण कीजिये ॥१२॥

भावार्थ : जल अग्नि से प्रयुक्त किये हुए रथ के विना कोई मनुष्य स्थल जल और अन्तरिक्षमार्गों में शीघ्र जानेको समर्थ नहीं हो सकता। इससे राज्यश्री, उत्तम सेना, और वीर पुरुषों को प्राप्त होके ऐसे विमानादि यानों से युद्ध में विजय को पा सकते हैं। इस कारण इस विद्या में मनुष्य सदा युक्त हों ॥१२॥ पूर्व सूक्त से इस विद्या के सिद्ध करनेवाले इन्द्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन किया तथा इस सूक्त से इस विद्या के साधक अश्वि अर्थात् द्यावा पृथिवी आदि अर्थ प्रतिपादन किये हैं इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पांचवां वर्ग और चौतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३४॥