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Rigveda / 5 / 54 / 6

अभ्रा॑जि॒ शर्धो॑ मरुतो॒ यद॑र्ण॒सं मोष॑था वृ॒क्षं क॑प॒नेव॑ वेधसः। अध॑ स्मा नो अ॒रम॑तिं सजोषस॒श्चक्षु॑रिव॒ यन्त॒मनु॑ नेषथा सु॒गम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 54 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अभ्रा॑जि। शर्धः॑। म॒रु॒तः॒। यत्। अ॒र्ण॒सम्। मोष॑थ। वृ॒क्षम्। क॒प॒नाऽइ॑व। वे॒ध॒सः॒। अध॑। स्म॒। नः॒। अ॒रम॑तिम्। स॒ऽजो॒ष॒सः॒। चक्षुः॑ऽइव। यन्त॑म्। अनु॑। ने॒ष॒थ॒। सु॒ऽगम् ॥६॥

पदार्थ : हे (मरुतः) मनुष्यो ! आप लोगों से (यत्) जो (शर्धः) बल (अभ्राजि) प्रकाशित किया जाता और (अर्णसम्) जल को जो तुम लोग (मोषथ) चुराइये तो आप लोगों को जैसे (वृक्षम्) वट आदि वृक्ष को (कपनेव) पवनों के गमन वैसे हम लोग दण्ड देवें (अध) इसके अनन्तर हे (वेधसः) बुद्धिमान् जनो ! (सजोषसः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले आप लोग (चक्षुरिव) नेत्र को जैसे वैसे (नः) हम लोगों के (अरमतिम्) रमणरहित (यन्तम्) प्राप्त होनेवाले (सुगम्) सुग अर्थात् उत्तमता से चलते हैं, जिसमें उसको (स्म) ही (अनु, नेषथ) अनुकूल प्राप्त कीजिये ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो सब के शरीर और आत्मा के बल को प्रकाशित करते हैं, वे धन्य हैं और जो श्रेष्ठ विद्या और गुणों को चुराते, उनको धिक्कार धिक्कार ॥६॥