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Rigveda / 5 / 54 / 14

यू॒यं र॒यिं म॑रुतः स्पा॒र्हवी॑रं यू॒यमृषि॑मवथ॒ साम॑विप्रम्। यू॒यमर्व॑न्तं भर॒ताय॒ वाजं॑ यू॒यं ध॑त्थ॒ राजा॑नं श्रुष्टि॒मन्त॑म् ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 54 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : राजादिकों से कौन-कौन रक्षा पाने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यू॒यम्। र॒यिम्। म॒रु॒तः॒। स्पा॒र्हऽवी॑रम्। यू॒यम्। ऋषि॑म्। अ॒व॒थ॒। साम॑ऽविप्रम्। यू॒यम्। अर्व॑न्तम्। भ॒र॒ताय॑। वाज॑म्। यू॒यम्। ध॒त्थ॒। राजा॑नम्। श्रु॒ष्टि॒ऽमन्त॑म् ॥१४॥

पदार्थ : हे (मरुतः) पुरुषार्थी मनुष्यो ! (यूयम्) आप लोग (स्पार्हवीरम्) अभिकाङ्क्षित वीर जिसमें उस (रयिम्) लक्ष्मी की (अवथ) रक्षा कीजिये और (यूयम्) आप लोग (सामविप्रम्) सामों में बुद्धिमान् (ऋषिम्) वेदार्थ के जाननेवाले की रक्षा कीजिये और (यूयम्) आप लोग (भरताय) धारण और पोषण के लिये (अर्वन्तम्) प्राप्त होते हुए (वाजम्) वेग, अन्न और विज्ञान आदि को (धत्थ) धारण करो और (यूयम्) आप लोग (श्रुष्टिमन्तम्) अच्छा क्षिप्रकरण जिसमें उस (राजानम्) न्याय और विनय से प्रकाशमान को धारण कीजिये ॥१४॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम सहाय से लक्ष्मी, विद्वान्, सेना और राजा को धारण करें ॥१४॥