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Rigveda / 5 / 55 / 6

यदश्वा॑न्धू॒र्षु पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं हिर॒ण्यया॒न्प्रत्यत्काँ॒ अमु॑ग्ध्वम्। विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ मरुतो॒ व्य॑स्यथ॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 55 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। अश्वा॑न्। धूः॒ऽसु। पृष॑तीः। अयु॑ग्ध्वम्। हि॒र॒ण्यया॑न्। प्रति॑। अत्का॑न्। अमु॑ग्ध्वम्। विश्वाः॑। इत्। स्पृधः॑। म॒रु॒तः॒। वि। अ॒स्य॒थ॒। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः॑। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥६॥

पदार्थ : हे (मरुतः) वायु के सदृश वेग और बल से युक्त जनो ! जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्त्तमान हैं, वैसे (धूर्षु) विमान आदि यानों के अवयव कोष्ठों में (यत्) जिन (हिरण्ययान्) ज्योतिर्मय (प्रति, अत्कान्) स्पष्ट (पृषतीः) वायु और जल के गमनों और (अश्वान्) अग्नि आदिकों को आप लोग (अयुग्ध्वम्) संयुक्त कीजिये और (अमुग्ध्वम्) त्यागिये, उनसे (विश्वाः) सम्पूर्ण (स्पृधः) स्पर्धायें, रोष (इत्) ही (वि) विशेष करके (अस्यथ) चलाइये ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य अग्नि, वायु और जल आदिकों को वाहनों में उत्तम प्रकार युक्त करते हैं, वे विजय के लिये समर्थ होकर धर्मसम्बन्धी मार्ग के अनुगामी होते हैं ॥६॥