Rigveda / 5 / 57 / 2
वाशी॑मन्त ऋष्टि॒मन्तो॑ मनी॒षिणः॑ सु॒धन्वा॑न॒ इषु॑मन्तो निष॒ङ्गिणः॑। स्वश्वाः॑ स्थ सु॒रथाः॑ पृश्निमातरः स्वायु॒धा म॑रुतो याथना॒ शुभ॑म् ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 57 | Mantra No : 2
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : marutaH | Metre : bRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vaashiimanta RRIShTimanto maniiShiNaH sudhanvaana iShumanto niSha~NgiNaH. svashvaaH stha surathaaH pRRishnimaataraH svaayudhaa maruto yaathanaa shubham .2.
Component Words : vaashii.amantaH. RRIShTi.amantaH. maniiShiNaH. su.adhanvaanaH. iShu.amantaH. niSha~NgiNaH. su.aashvaaH. stha. su.arathaaH. pRRishni.amaataraH. su.aaayudhaaH. marutaH. yaathana. shubham .2.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब पवनों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : वाशी॑ऽमन्तः। ऋ॒ष्टि॒ऽमन्तः॑। म॒नी॒षिणः॑। सु॒ऽधन्वा॑नः। इषु॑ऽमन्तः। नि॒ष॒ङ्गिणः॑। सु॒ऽअश्वाः॑। स्थ॒। सु॒ऽरथाः॑। पृ॒श्नि॒ऽमात॒रः॒। सु॒ऽआ॒यु॒धाः। म॒रु॒तः॒। या॒थ॒न॒। शुभ॑म् ॥२॥
पदार्थ : हे (पृश्निमातरः) अन्तरिक्ष माता के सदृश जिनका ऐसे (मरुतः) उत्तम प्रकार शिक्षित जनो ! आप लोग (वाशीमन्तः) उत्तम वाणी जिनकी वा जो (ऋष्टिमन्तः) ज्ञानवाले (मनीषिणः) वा मन की इच्छा करनेवाले (सुधन्वानः) सुन्दर धनुष जिनका (इषुमन्तः) वा वाणोंवाले और (निषङ्गिणः) अच्छे तरवार आदि पदार्थ जिनके वा जो (स्वश्वाः) उत्तम घोड़ों से युक्त (स्वायुधाः) सुन्दर आयुधोंवाले वा (सुरथाः) सुन्दर रथ जिनके ऐसे (स्थ) होओ और (शुभम्) कल्याणकारक व्यवहार वा संग्राम को (याथना) प्राप्त होओ ॥२॥
भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके सदा ही विजय से युक्त हों ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ मरुद्गुणानाह ॥
पदपाठ : वाशी॑ऽमन्तः। ऋ॒ष्टि॒ऽमन्तः॑। म॒नी॒षिणः॑। सु॒ऽधन्वा॑नः। इषु॑ऽमन्तः। नि॒ष॒ङ्गिणः॑। सु॒ऽअश्वाः॑। स्थ॒। सु॒ऽरथाः॑। पृ॒श्नि॒ऽमात॒रः॒। सु॒ऽआ॒यु॒धाः। म॒रु॒तः॒। या॒थ॒न॒। शुभ॑म् ॥२॥
पदार्थ : (वाशीमन्तः) प्रशस्ता वाग् विद्यते येषान्ते (ऋष्टिमन्तः) ज्ञानवन्तः (मनीषिणः) मनसा ईषिणः (सुधन्वानः) शोभनं धनुर्येषान्ते (इषुमन्तः) वाणवन्तः (निषङ्गिणः) निषङ्गाः प्रशस्ता अस्यादयो येषान्ते (स्वश्वाः) उत्तमाश्वाः (स्थ) भवथ (सुरथाः) शोभना रथा येषान्ते (पृश्निमातरः) पृश्निरन्तरिक्षं मातेव येषान्ते (स्वायुधाः) शोभनान्यायुधानि येषान्ते (मरुतः) सुशिक्षिता मानवाः (याथना) गच्छथ। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (शुभम्) कल्याणं सङ्ग्रामं वा ॥२॥
अन्वय : हे पृश्निमातरो मरुतो ! यूयं वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणस्सुधन्वान इषुमन्तो निषङ्गिणः स्वश्वाः स्वायुधाः सुरथाश्च स्थ शुभं याथना ॥२॥
भावार्थ : मनुष्यैर्विद्यादिशुभान् गुणान् गृहीत्वा सदैव विजयेन युक्तैर्भवितव्यम् ॥२॥