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Rigveda / 1 / 35 / 5

वि जना॑ञ्छ्या॒वाः शि॑ति॒पादो॑ अख्य॒न्रथं॒ हिर॑ण्यप्रउगं॒ वह॑न्तः । शश्व॒द्विशः॑ सवि॒तुर्दैव्य॑स्यो॒पस्थे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि तस्थुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 35 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : सविता | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

पदपाठ : वि । जना॑न् । श्या॒वाः । शि॒ति॒ऽपादः॑ । अ॒ख्य॒न् । रथ॑म् । हिर॑ण्यऽप्रऽउग॒म् । वह॑न्तः । शश्व॑त् । विशः॑ । स॒वि॒तुः । दैव्य॑स्य । उ॒पऽस्थे॑ । विश्वा॑ । भुव॑नानि । त॒स्थुः॒॥

पदार्थ : हे सज्जन पुरुष ! आप जैसे जिस (दैव्यस्य) विद्वान् वा दिव्य पदार्थों में उत्पन्न होनेवाले (सवितुः) सूर्यलोक की (उपस्थे) गोद अर्थात् आकर्षण शक्ति में (विश्वा) सब (भुवनानि) पृथिवी आदि लोक (तस्थुः) स्थित होते हैं उसके (शितिपादः) अपने श्वेत अवयवों से युक्त (श्यावाः) प्राप्ति होनेवाले किरण (जनान्) विद्वानों (हिरण्यप्रउगम्) जिसमें ज्योति रूप अग्नि के मुख के समान स्थान हैं उस (रथम्) विमान आदि यान और (शश्वत्) अनादि रूप (विशः) प्रजाओं को (वहन्तः) धारण और बढ़ाते हुए (अख्यन्) अनेक प्रकार प्रगट होते हैं वैसे तेरे समीप विद्वान् लोग रहैं और तूं भी विद्या तथा धर्म का प्रचार कर ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम जैसे सूर्यलोक के प्रकाश का आकर्षण आदि गुण सब जगत् को धारणपूर्वक यथायोग्य प्रगट करते हैं। और जो सूर्य के समीप लोक हैं वे सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। जो अनादि रूप प्रजा है उसका भी वायु धारण करता है इस प्रकार होने से सब लोक अपनी-२ परिधि में स्थित होते हैं वैसे तुम सद्गुणों का धारण और अपने-२ अधिकारों में स्थित होकर अन्य सबको न्याय मार्ग में स्थापन किया करो ॥५॥