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Rigveda / 5 / 63 / 6

वाचं॒ सु मि॑त्रावरुणा॒विरा॑वतीं प॒र्जन्य॑श्चि॒त्रां व॑दति॒ त्विषी॑मतीम्। अ॒भ्रा व॑सत म॒रुतः॒ सु मा॒यया॒ द्यां व॑र्षयतमरु॒णाम॑रे॒पस॑म् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 63 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अर्चनाना आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर मित्रावरुणवाच्य विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वाच॑म्। सु। मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒। इरा॑ऽवतीम्। प॒र्जन्यः॑। चि॒त्राम्। व॒द॒ति॒। त्विषि॑ऽमतीम्। अ॒भ्रा। व॒स॒त॒। म॒रुतः॑। सु। मा॒यया॑। द्याम्। व॒र्ष॒य॒त॒म्। अ॒रु॒णाम्। अ॒रे॒पस॑म् ॥६॥

पदार्थ : हे (मित्रावरुणौ) पढ़ाने और पढ़नेवाले जनो ! आप दोनों जैसे (पर्जन्यः) मेघ (वदति) शब्द करता है, वैसे (इरावतीम्) जल विद्यमान जिसमें उस (त्विषीमतीम्) अच्छी विद्याओं के प्रकाश से युक्त (चित्राम्) अद्भुत (वाचम्) वाणी को कहो जैसे (अभ्रा) मेघ प्रकाश में हैं, वैसे ही (मरुतः) मनुष्य (सु, मायया) उत्तम बुद्धि से (सु) उत्तम प्रकार (वसत) बसें और हे मित्रावरुण ! (अरुणाम्) प्राप्त होने योग्य (अरेपसम्) अपराधरहित (द्याम्) कामना की आप लोग (वर्षयतम्) वृष्टि करिये ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्या से युक्त वाणी को प्राप्त होकर मेघ के सदृश मनोरथों की वृष्टि करते हैं, वे बुद्धि से विद्वान् करके [=बनाके] अपराधरहित करते हैं ॥६॥