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Rigveda / 5 / 67 / 5

को नु वां॑ मि॒त्रास्तु॑तो॒ वरु॑णो वा त॒नूना॑म्। तत्सु वा॒मेष॑ते म॒तिरत्रि॑भ्य॒ एष॑ते म॒तिः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 67 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : यजत आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : मनुष्य विद्वानों से किस प्रकार विद्या ग्रहण करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : कः। नु। वा॒म्। मि॒त्र॒। अस्तु॑तः। वरु॑णः। वा॒। त॒नूना॑म्। तत्। सु। वा॒म्। आ। ई॒ष॒ते॒। म॒तिः। अत्रि॑ऽभ्यः। आ। ई॒ष॒ते॒। म॒तिः ॥५॥

पदार्थ : हे (मित्र) मित्र (वाम्) आप दोनों के (तनूनाम्) शरीरों के (कः) कौन (आ, ईषते) सब प्रकार से प्राप्त होता है, आप (वा) वा (वरुणः) उत्तम स्वभावयुक्त कौन (नु) शीघ्र (अस्तुतः) नहीं प्रशंसित है और जो (वाम्) आप दोनों की (मतिः) बुद्धि हम लोगों को (आ, ईषते) सब प्रकार प्राप्त होती है और (अत्रिभ्यः) व्याप्त विद्या जिनमें उनके लिये (मतिः) मननशील अन्तःकरण की वृत्ति (सु) उत्तम प्रकार प्राप्त होती है (तत्) उसका हम लोग स्वीकार करें ॥५॥

भावार्थ : जो मनुष्य अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर उनके उपदेश और विद्या को ग्रहण करके उनसे बुद्धि और उत्तम क्रिया का स्वीकार करते हैं, वे प्रसिद्ध स्तुतिवाले होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सड़सठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥