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Rigveda / 5 / 68 / 5

वृ॒ष्टिद्या॑वा री॒त्या॑पे॒षस्पती॒ दानु॑मत्याः। बृ॒हन्तं॒ गर्त॑माशाते ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 68 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : यजत आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या जान क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वृ॒ष्टिऽद्या॑वा री॒तिऽआ॑पा। इ॒षः। पती॒ इति॑। दानु॑ऽमत्याः। बृ॒हन्त॑म्। गर्त॑म्। आ॒शा॒ते॒ इति॑ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (वृष्टिद्यावा) वृष्टि और अन्तरिक्ष के कारण (रीत्यापा) रीति और जल जिनके सम्बन्ध में वह (इषः) अन्न आदि के (पती) पालक वायु और विद्युदग्नि (दानुमत्याः) बहुत दान विद्यमान जिसमें उस पृथिवी के मध्य में (बृहन्तम्) बड़े (गर्त्तम्) गृह को (आशाते) व्याप्त होते हैं, उन दोनों को आप लोग जान के उपकार करो ॥५॥

भावार्थ : जो मनुष्य वृष्टि आदि में कारण सूर्य्य, वायु और बिजुली आदि को जानें तो उस कार्य्य को कर सकें ॥५॥ इस सूक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अड़सठवाँ सूक्त और छठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥