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Rigveda / 5 / 73 / 2

इ॒ह त्या पु॑रु॒भूत॑मा पु॒रू दंसां॑सि॒ बिभ्र॑ता। व॒र॒स्या या॒म्यध्रि॑गू हु॒वे तु॒विष्ट॑मा भु॒जे ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 73 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : बाहुवृक्त आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒ह। त्या। पु॒रु॒ऽभूत॑मा। पु॒रु। दंसां॑सि। बिभ्र॑ता। व॒र॒स्या। या॒मि॒। अध्रि॑गू॒ इत्यध्रि॑ऽगू। हु॒वे। तु॒विःऽत॑मा। भु॒जे ॥२॥

पदार्थ : हे स्त्रि ! जिन (पुरुभूतमा) अत्यन्त बहुत व्यापक (पुरु) बहुत (दंसांसि) कर्म्मों को (बिभ्रता) धारण करते हुए (वरस्या) अत्यन्त श्रेष्ठ और (तुविष्टमा) अत्यन्त बलिष्ठ (अध्रिगू) अधिक चलनेवालों को (इह) इस संसार में (भुजे) भोग के लिये (हुवे) स्वीकार करता हूँ, जिन दोनों से इष्टसिद्धि को (यामि) प्राप्त होता हूँ (त्या) उन दोनों को तू भी संप्रयुक्त कर ॥२॥

भावार्थ : जहाँ स्त्री और पुरुष तुल्य गुण, कर्म्म, स्वभाव और सुरूपवान् हैं, वहाँ सम्पूर्ण पदार्थविद्या होती है ॥२॥