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Rigveda / 5 / 73 / 7

उ॒ग्रो वां॑ ककु॒हो य॒यिः शृ॒ण्वे यामे॑षु संत॒निः। यद्वां॒ दंसो॑भिरश्वि॒नात्रि॑र्नराव॒वर्त॑ति ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 73 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : पौर आत्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒ग्रः। वा॒म्। क॒कु॒हः। य॒यिः। शृ॒ण्वे। यामे॑षु। स॒म्ऽत॒निः। यत्। वा॒म्। दंसः॑ऽभिः। अ॒श्वि॒ना॒। अत्रिः॑। न॒रा॒। आ॒ऽव॒वर्त॑ति ॥७॥

पदार्थ : हे (नरा) नायक (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! (यत्) जो (ययिः) चलनेवाला (ककुहः) बड़ा (उग्रः) तेजस्वी (सन्तनिः) उत्तम प्रकार विस्तारकर्त्ता मैं (यामेषु) प्रहरों में (वाम्) आप दोनों को (शृण्वे) सुनूँ और जो (वाम्) आप दोनों के (दंसोभिः) कर्म्मों से (अत्रिः) न तीन वार (आववर्त्तति) अत्यन्त वर्त्तमान हैं, उन हम दोनों को आप दोनों बोध कराइये ॥७॥

भावार्थ : जो मनुष्य सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश नियम से वर्त्ताव करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे सर्वदा उन्नत होते हैं ॥७॥