Rigveda / 5 / 74 / 2
कुह॒ त्या कुह॒ नु श्रु॒ता दि॒वि दे॒वा नास॑त्या। कस्मि॒न्ना य॑तथो॒ जने॒ को वां॑ न॒दीनां॒ सचा॑ ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 74 | Mantra No : 2
In English:
Seer : paura aatreyaH | Devta : ashvinau | Metre : viraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kuha tyaa kuha nu shrutaa divi devaa naasatyaa. kasminnaa yatatho jane ko vaa.m nadiinaa.m sachaa .2.
Component Words : kuha. tyaa. kuha. nu. shrutaa. divi. devaa. naasatyaa. kasmin. aa. yatathaH. jane. kaH. vaam. nadiinaam. sachaa .2.
In Hindi:
ऋषि : पौर आत्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर मनुष्यों को विद्वानों के प्रति कैसे पूछना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : कुह॑। त्या। कुह॑। नु। श्रु॒ता। दि॒वि। दे॒वा। नास॑त्या। कस्मि॑न्। आ। य॒त॒थः॒। जने॑। कः। वा॒म्। न॒दीना॑म्। सचा॑ ॥२॥
पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! (त्या) ये (नासत्या) सत्यस्वरूप (कुह) कहाँ वर्त्तमान हैं और (कुह) कहाँ (श्रुता) सुने हुए (देवा) श्रेष्ठ गुणवाले होते हैं और तुम (कस्मिन्) किस (जने) जन में (आ, यतथः) सब ओर से यत्न करते हो (वाम्) उन आप दोनों की (नदीनाम्) नदियों के (सचा) सम्बन्ध से (कः) कौन (नु) शीघ्र है जो (दिवि) श्रेष्ठ व्यवहार वा प्रकाश में प्रयत्न करते हो ॥२॥
भावार्थ : जिज्ञासु जनों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर बिजुली आदि की विद्याओं को पूछें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : पौर आत्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनर्मनुष्यैर्विदुषः प्रति कथं प्रष्टव्यमित्याह ॥
पदपाठ : कुह॑। त्या। कुह॑। नु। श्रु॒ता। दि॒वि। दे॒वा। नास॑त्या। कस्मि॑न्। आ। य॒त॒थः॒। जने॑। कः। वा॒म्। न॒दीना॑म्। सचा॑ ॥२॥
पदार्थ : (कुह) क्व (त्या) तौ (कुह) (नु) सद्यः (श्रुता) श्रुतौ (दिवि) दिव्ये व्यवहारे प्रकाशे वा (देवा) दिव्यगुणौ (नासत्या) सत्यस्वरूपौ (कस्मिन्) (आ) (यतथः) यतेथे। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदम्। (जने) (कः) (वाम्) युवाम् (नदीनाम्) (सचा) समवाये ॥२॥
अन्वय : हे अध्यापकोपदेशकौ ! त्या नासत्या कुह वर्त्तेते कुह श्रुता देवा भवतो युवां कस्मिञ्जन आ यतथो वां तयोर्युवयोर्नदीनां सचा को न्वस्ति यौ दिव्या यतथः ॥२॥
भावार्थ : जिज्ञासुभिर्विदुषां सनीडं गत्वा विद्युदादिविद्याः प्रष्टव्याः ॥२॥