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Rigveda / 5 / 74 / 9

शमू॒ षु वां॑ मधूयुवा॒स्माक॑मस्तु चर्कृ॒तिः। अ॒र्वा॒ची॒ना वि॑चेतसा॒ विभिः॑ श्ये॒नेव॑ दीयतम् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 74 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : पौर आत्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : शम्। ऊँ॒ इति॑। सु। वा॒म्। म॒धु॒ऽयु॒वा॒। अ॒स्माक॑म्। अ॒स्तु॒। च॒र्कृ॒तिः। अ॒र्वा॒ची॒ना। वि॒ऽचे॒त॒सा॒। विऽभिः॑। श्ये॒नाऽइ॑व। दी॒य॒त॒म् ॥९॥

पदार्थ : हे (मधूयुवा) माधुर्य्य गुण से युक्त (विचेतसा) अनेक प्रकार के विज्ञानवाले (अर्वाचीना) सन्मुख चलते हुए दो जनो ! (वाम्) आप दोनों की जो (चर्कृतिः) अत्यन्त क्रिया है वह (अस्माकम्) हम लोगों की (अस्तु) हो जिससे आप दोनों (उ) ही (विभिः) पक्षियों के साथ (श्येनेव) वाज पक्षी के सदृश (शम्) सुख वा कल्याण को (सु, दीयतम्) उत्तम प्रकार देवें ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् हैं, जो अपने ऐश्वर्य्य को अन्य जनों के सुख के लिये नियुक्त करते हैं, जैसे पक्षियों के साथ श्येन पक्षी शीघ्र चलता है, वैसे इनके साथ विद्यार्थी जन पूर्ण रीति से चलें ॥९॥