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Rigveda / 5 / 75 / 6

आ वां॑ नरा मनो॒युजोऽश्वा॑सः प्रुषि॒तप्स॑वः। वयो॑ वहन्तु पी॒तये॑ स॒ह सु॒म्नेभि॑रश्विना॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 75 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : मनुष्यों को शिल्पविद्या से कार्य्य सिद्ध करने चाहियें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। वा॒म्। न॒रा॒। म॒नः॒ऽयुजः॑। अश्वा॑सः। प्रु॒षि॒तऽप्स॑वः। वयः॑। व॒ह॒न्तु॒। पी॒तये॑। स॒ह। सु॒म्नेभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। माध्वी॒ इति॑। मम॑। श्रु॒त॒म्। हव॑म् ॥६॥

पदार्थ : हे (माध्वी) मधुर स्वभावयुक्त (नरा) नायक (अश्विना) शिल्पविद्या के जाननेवालो ! आप लोगो आप दोनों (सुम्नेभिः) सुखों के (सह) साथ (पीतये) पान के लिये जो (वाम्) आप दोनों के (मनोयुजः) मन के सदृश युक्त होनेवाले अत्यन्त वेगवान् (प्रुषितप्सवः) जलाया ईंधन आदि जिन्होंने ऐसे (वयः) व्याप्तिशील (अश्वासः) वेग आदि गुण हैं वे वाहनों को (आ) सब प्रकार से (वहन्तु) पहुँचावें उनके लिये (मम) मेरे (हवम्) आह्वान को (श्रुतम्) सुनिये ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य पदार्थविद्या से शिल्पसिद्ध कार्य्यों को सिद्ध करें तो अधिक धनी होवें ॥६॥