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Rigveda / 5 / 76 / 5

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 76 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्यों को चाहिये कि पुरुषार्थ और विद्वानों के सङ्ग से ऐश्वर्य्य को प्राप्त करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सम्। अ॒श्विनोः। अव॑सा। नूत॑नेन। म॒यः॒ऽभुवा॑। सु॒ऽप्रनी॑ती। ग॒मे॒म॒। आ। नः॒। र॒यिम्। व॒ह॒त॒म्। आ। उ॒त। वी॒रान्। आ। विश्वा॑नि। अ॒मृ॒ता॒। सौभ॑गानि ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (अश्विनोः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश राजा और उपदेशक के (नूतनेन) नवीन (अवसा) अन्न आदि और (मयोभुवा) सुखकारक से और (सुप्रणीती) उत्तम नीति से (नः) हम लोगों के लिये (रयिम्) धन को (आ) सब प्रकार (वहतम्) प्राप्त कराते हुए को (वीरान्) वीरों को (उत) और (विश्वानि) सम्पूर्ण (अमृता) स्वादु जलों और (सौभगानि) उत्तम धनादि ऐश्वर्यों के भावरूपों को (आ) सब प्रकार प्राप्त कराते हुए को हम लोग (सम्, आ, गमेम) उत्तम प्रकार से प्राप्त होवें, वैसे आप लोग भी प्राप्त होओ ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो लोग यथार्थवक्ताओं के उपदेश से राजा की न्यायव्यवस्था के साथ वर्त्ताव करके न्याय से उत्तम पुरुषों को और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त होते हैं, वे अभीष्ट पदार्थों की सिद्धि को प्राप्त होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, अश्वि, राजा और उपदेशक के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छहत्तरवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥