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Rigveda / 5 / 78 / 5

वि जि॑हीष्व वनस्पते॒ योनिः॒ सूष्य॑न्त्याइव। श्रु॒तं मे॑ अश्विना॒ हवं॑ स॒प्तव॑ध्रिं च मुञ्चतम् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 78 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सप्तवध्रिरात्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। जि॒ही॒ष्व॒। व॒न॒स्प॒ते॒। योनिः॑। सूष्य॑न्त्याःऽइव। श्रु॒तम्। मे॒। अ॒श्वि॒ना॒। हव॑म्। स॒प्तऽव॑ध्रिम्। च॒। मु॒ञ्च॒त॒म् ॥५॥

पदार्थ : हे (अश्विना) विद्या से व्याप्त अध्यापक और परीक्षकजनो ! (मे) मेरे (हवम्) शब्द को (श्रुतम्) श्रवण को और (सप्तवध्रिम्) नष्ट हुए सात इन्द्रिय जिसके उसका (च) और (मुञ्चतम्) त्याग करो और (वनस्पते) हे वनस्पति ! (सूष्यन्त्याइव) गर्भवती स्त्री के सदृश (योनिः) कारण आप (वि) विशेष करके (जिहीष्व) त्याग करो ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । आप लोग यथार्थवक्ता अध्यापक और उपदेशकों की इच्छा करिये और जैसे गर्भवती स्त्री बालक का त्याग करती है, वैसे ही अन्तःकरणः से अविद्या को दूर करिये ॥५॥