Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 79 / 5

यच्चि॒द्धि ते॑ ग॒णा इ॒मे छ॒दय॑न्ति म॒घत्त॑ये। परि॑ चि॒द्वष्ट॑यो दधु॒र्दद॑तो॒ राधो॒ अह्र॑यं॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 79 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सत्यश्रवा आत्रेयः | देवता : उषाः | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। चि॒त्। हि। ते॒। ग॒णाः। इ॒मे। छ॒दय॑न्ति। म॒घत्त॑ये। परि॑। चि॒त्। वष्ट॑यः। द॒धुः॒। दद॑तः। राधः॑। अह्र॑यम्। सुऽजा॑ते। अश्व॑ऽसूनृते ॥५॥

पदार्थ : हे (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान से युक्त (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई विदुषि स्त्रि ! (यत्) जो (इमे) ये (वष्टयः) कामना करते हुए (ते) आप के (गणाः) समूह (मघत्तये) धनदान के लिये (अह्रयम्) लज्जा आदि दोष से रहित को (चित्) और (राधः) धन को (ददतः) देनेवालों को (चित्) निश्चय (छदयन्ति) प्रबल करते हैं, वे निश्चय (हि) ही सुखों की (परि, दधुः) धारण करें ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःकाल के किरणसमूह अपने तेज से सब को ढाँपते हैं, वैसे ही शुभगुणवाली स्त्रियाँ अपने शुभगुणों से सब को आच्छादित करती हैं ॥५॥