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Rigveda / 5 / 81 / 5

उ॒तेशि॑षे प्रस॒वस्य॒ त्वमेक॒ इदु॒त पू॒षा भ॑वसि देव॒ याम॑भिः। उ॒तेदं विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि रा॑जसि श्या॒वाश्व॑स्ते सवितः॒ स्तोम॑मानशे ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 81 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : सविता | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ईश्वरविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। ई॒शि॒षे॒। प्र॒ऽस॒वस्य॑। त्वम्। एकः॑। इत्। उ॒त। पू॒षा। भ॒व॒सि॒। दे॒व॒। याम॑ऽभिः। उ॒त। इ॒दम्। विश्व॑म्। भुव॑नम्। वि। रा॒ज॒सि॒। श्या॒वऽअ॑श्वः। ते॒। स॒वि॒त॒रिति॑। स्तोम॑म्। आ॒न॒शे॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (सवितः) सत्य व्यवहार में प्रेरणा करने और (देव) सम्पूर्ण सुखों के देनेवाले (ते) आपका जो (श्यावाश्वः) सूर्यलोक (यामभिः) प्रहरों से (स्तोमम्) प्रशंसा को (आनशे) व्याप्त होता है, उसके दृष्टान्त से (उत) भी (इदम्) इस (विश्वम्) समस्त (भुवनम्) भुवन को (त्वम्) आप (वि, राजसि) प्रकाशित करते हो (उत) और (पूषा) पुष्टि करनेवाले (भवसि) होते हो (उत) और (एकः) द्वितीयरहित (इत्) ही (प्रसवस्य) उत्पन्न हुए जगत् के (ईशिषे) ऐश्वर्य का विधान करते हो ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिसके महत्त्व के जनाने के लिये सूर्य्य आदि लोक दृष्टान्त हैं, उसी सम्पूर्ण परमैश्वर्य के देनेवाले का तुम ध्यान करो ॥५॥ इस सूक्त में सत्य व्यवहार में प्रेरणा करनेवाले ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इक्यासीवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥