Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 87 / 7

ते रु॒द्रासः॒ सुम॑खा अ॒ग्नयो॑ यथा तुविद्यु॒म्ना अ॑वन्त्वेव॒याम॑रुत्। दी॒र्घं पृ॒थु प॑प्रथे॒ सद्म॒ पार्थि॑वं॒ येषा॒मज्मे॒ष्वा म॒हः शर्धां॒स्यद्भु॑तैनसाम् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 87 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : एवयामरुदात्रेयः | देवता : मरूतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ते। रु॒द्रासः॑। सुऽम॑खाः। अ॒ग्नयः॑। य॒था॒। तु॒वि॒ऽद्यु॒म्नाः। अ॒व॒न्तु॒। ए॒व॒याम॑रुत्। दी॒र्घम्। पृ॒थु। प॒प्र॒थे॒। सद्म॑। पार्थि॑वम्। येषा॑म्। अज्मे॑षु। आ। म॒हः। शर्धां॑सि। अद्भु॑तऽएनसाम् ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ते) वे (सुमखाः) सुन्दर न्यायाचरण और यज्ञ के करनेवाले (रुद्रासः) मध्यम विद्वान् जन (यथा) जैसे (अग्नयः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान (तुविद्युम्नाः) बहुत धन और यश से युक्त हुए हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें (येषाम्) जिन (अद्भुतैनसाम्) अद्भुत बड़े पापवालों के (अज्मेषु) संग्रामों में (शर्धांसि) बलों और (महः) बड़े (दीर्घम्) लम्बे (पृथु) विस्तृत वा प्रसिद्ध (पार्थिवम्) पृथिवी में विदित (सद्म) ठहरते हैं जिसमें उस स्थान को (एवयामरुत्) बुद्धिमान् पुरुष (आ, प्रपथे) अच्छे प्रकार प्रसिद्ध करता है ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य अग्नि के सदृश पाप के नाश करने, सत्य के प्रकाश करने और दुष्टों के रुलानेवाले, श्रेष्ठों के पालक हैं, वे ही अधिक कीर्त्तिवाले होते हैं ॥७॥