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Rigveda / 1 / 36 / 16

घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स्तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक् । यो मर्त्यः॒ शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा नः॒ स रि॒पुरी॑शत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर भी अगले मंत्र में उसी सभाध्यक्ष का उपदेश किया है।

पदपाठ : घ॒नाऽइ॑व । विष्व॑क् । वि । ज॒हि॒ । अरा॑व्णः । तपुः॑ऽजम्भ । यः । अ॒स्म॒ऽध्रुक् । यः । मर्त्यः॑ । शिशी॑ते । अति॑ । अ॒क्तुऽभिः॑ । मा । नः॒ । सः । रि॒पुः । ई॒श॒त॒॥

पदार्थ : हे (तपुर्ज्जम्भ) शत्रुओं को सताने और नाश करने के शस्त्र बांधनेवाले सेनापते ! (विष्वक्) सर्वथा सेनादिबलों से युक्त होके आप (अराव्णः) सुखदानरहित शत्रुओं को (घनेव) घन के समान (विजहि) विशेष करके जीत और (यः) जो (मर्त्यः) मनुष्य (अक्तुभिः) रात्रियों से (अस्मद्ध्रुक्) हमारा द्रोही (अतिशिशीते) अति हिंसा करता हो (सः) सो (रिपुः) वैरी (नः) हम लोगों को पीड़ा देने में (मा) मत (ईशत) समर्थ होवें ॥१६॥

भावार्थ : इस मंत्र में उपमा अलंकार है। सेनाध्यक्षादि लोग जैसे लोहा के घन से लोहे और पाषाणादिकों को तोड़ते हैं वैसे ही अधर्म्मी दुष्टशत्रुओं के अङ्गों को छिन्न-भिन्न कर दिन रात धर्म्मात्मा प्रजाजनों के पालन में तत्पर हों जिससे शत्रुजन इन प्रजाओं को दुःख देने को समर्थ न हो सकें ॥१६॥