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Rigveda / 6 / 3 / 1

अग्ने॒ स क्षे॑षदृत॒पा ऋ॑ते॒जा उ॒रु ज्योति॑र्नशते देव॒युष्टे॑। यं त्वं मि॒त्रेण॒ वरु॑णः स॒जोषा॒ देव॒ पासि॒ त्यज॑सा॒ मर्त॒मंहः॑ ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 3 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब आठ ऋचावाले तीसरे सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अग्ने॑। सः। क्षे॒ष॒त्। ऋ॒त॒ऽपाः। ऋ॒ते॒ऽजाः। उ॒रु। ज्योतिः॑। न॒श॒ते॒। दे॒व॒ऽयुः। ते॒। यम्। त्वम्। मि॒त्रेण॑। वरु॑णः। स॒ऽजोषाः। देव॑। पासि॑। त्यज॑सा। मर्त॑म्। अंहः॑ ॥१॥

पदार्थ : हे (देव) सुख के देनेवाले (अग्ने) बिजुली के सदृश तेजस्वी विद्वान् जैसे (ऋतपाः) सत्य का पालन करने और (ऋतेजाः) सत्य में प्रकट होनेवाला सूर्य्य (उरु) बड़े (ज्योतिः) प्रकाश को (नशते) प्राप्त होता है, वैसे (देवयुः) विद्वानों की कामना करता हुआ (ते) आपके (मित्रेण) मित्र के सहित (वरुणः) श्रेष्ठ (सजोषाः) तुल्य प्रीति का सेवन करनेवाला वर्त्तमान है और (यम्) जिस (अंहः) अपराधी (मर्त्तम्) मनुष्य की (त्वम्) आप (त्यजसा) त्याग से (पासि) रक्षा करते हो (सः) वह पुण्यात्मा होता हुआ (क्षेषत्) निवास करता है ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे ईश्वर से रचा गया सूर्य्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग से हुए विद्वान् सब के आत्माओं को प्रकाशित करते हैं और जैसे सूर्य्य अन्धकार का नाश करके दिन को प्रकट करता है, वैसे ही विद्या को प्राप्त हुआ धार्मिक विद्वान् अविद्या का नाश करके विद्या को प्रकट करता है ॥१॥