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Rigveda / 6 / 3 / 6

स ईं॑ रे॒भो न प्रति॑ वस्त उ॒स्राः शो॒चिषा॑ रारपीति मि॒त्रम॑हाः। नक्तं॒ य ई॑मरु॒षो यो दिवा॒ नॄनम॑र्त्यो अरु॒षो यो दिवा॒ नॄन् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 3 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। ई॒म्। रे॒भः। न। प्रति॑। व॒स्ते॒। उ॒स्राः। शो॒चिषा॑। र॒र॒पी॒ति॒। मि॒त्रऽम॑हाः। नक्त॑म्। यः। ई॒म्। अ॒रु॒षः। यः। दिवा॑। नॄन्। अम॑र्त्यः। अ॒रु॒षः। यः। दिवा॑। नॄन् ॥६॥

पदार्थ : (यः) जो (अरुषः) रक्तगुण के सहित वर्त्तमान (नक्तम्) रात्रि को (ईम्) सब ओर से (यः) जो (अमर्त्यः) अपने रूप से मृत्युरहित (दिवा) कामना से (नॄन्) नायक मनुष्यों को (यः) जो (अरुषः) मर्मस्थलों में वर्त्तमान हुआ (दिवा) कामना वा प्रीति के साथ (नॄन्) नायक जनों के साथ मिलता है (सः) वह (ईम्) जल और (रेभः) आदर करने योग्य विद्वान् वा विद्वानों का सत्कार करनेवाला (न) जैसे वैसे (शोचिषा) दीप्ति के सहित वर्त्तमान (उस्राः) किरणों को (प्रति, वस्ते) आच्छादित करता है और (मित्रमहाः) मित्रों का आदर करनेवाला (रारपीति) अत्यन्त शब्द करता है ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य जल का आकर्षण कर और उस जल को वर्षाय के प्राणियों के लिये सुख देता है, वैसे विद्वान् पुरुष गुणों का आकर्षण कर और गुणों को दे करके सब जिज्ञासु जनों को सुख देता है ॥६॥