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Rigveda / 1 / 36 / 19

नि त्वाम॑ग्ने॒ मनु॑र्दधे॒ ज्योति॒र्जना॑य॒ शश्व॑ते । दी॒देथ॒ कण्व॑ ऋ॒तजा॑त उक्षि॒तो यं न॑म॒स्यन्ति॑ कृ॒ष्टयः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : पथ्यावृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उन राजपुरुषों के सहायक जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : नि । त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । मनुः॑ । द॒धे॒ । ज्योतिः॑ । जना॑य । शश्व॑ते । दी॒देथ॑ । कण्वे॑ । ऋ॒तऽजा॑तः । उ॒क्षि॒तः । यम् । न॒म॒स्यन्ति॑ । कृ॒ष्टयः॑॥

पदार्थ : हे (अग्ने) परमात्मन् ! (यम्) जिस परमात्मा (त्वाम्) आपको (शश्वते) अनादि स्वरूप (जनाय) जीवों की रक्षा के लिये (कृष्टयः) सब विद्वान् मनुष्य (नमस्यन्ति) पूजा और हे विद्वान् लोगो ! जिसको आप (दीदेथ) प्रकाशित करते हैं उस (ज्योतिः) ज्ञान के प्रकाश करनेवाले परब्रह्म को (ऋतजातः) सत्याचरण से प्रसिद्ध (उक्षितः) आनन्दित (मनुः) विज्ञानयुक्त मैं (कण्वे) बुद्धिमान मनुष्य में (निदथे) स्थापित करता हूँ उसकी सब मनुष्य लोग उपासना करें ॥१९॥

भावार्थ : सबके पूजने योग्य परमात्मा के कृपाकटाक्ष से प्रजा की रक्षा के लिये राज्य के अधिकारी सब मनुष्यों को योग्य है कि सत्यव्यवहार की प्रसिद्धि से धर्मात्माओं को आनन्द और दुष्टों को ताड़ना देवें ॥१९॥