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Rigveda / 6 / 4 / 5

निति॑क्ति॒ यो वा॑र॒णमन्न॒मत्ति॑ वा॒युर्न राष्ट्र्यत्ये॑त्य॒क्तून्। तु॒र्याम॒ यस्त॑ आ॒दिशा॒मरा॑ती॒रत्यो॒ न ह्रुतः॒ पत॑तः परि॒ह्रुत् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 4 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : निऽति॑क्ति। यः। वा॒र॒नम्। अन्न॑म्। अत्ति॑। वा॒युः। न। राष्ट्री॑। अति॑। ए॒ति॒। अ॒क्तून्। तु॒र्यामः॑। यः। ते॒। आ॒ऽदिशा॑म्। अरा॑तीः। अत्यः॑। न। ह्रुतः॑। पत॑तः। प॒रि॒ऽह्रुत् ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो विद्वान् (नितिक्ति) अत्यन्त तीक्ष्ण किये (वारणम्) स्वीकार करने और (अन्नम्) खाने योग्य पदार्थ को (अत्ति) भक्षण करता और (वायुः) पवन (न) जैसे (अक्तून्) प्रसिद्ध पदार्थों को (अति, एति) व्याप्त होता है और (यः) जो (पततः) पतनशील (ते) आप का (ह्रुतः) कुटिलता को प्राप्त हुआ (अत्यः) मार्ग को व्याप्त हुए घोड़े के (न) समान (परिह्रुत्) सब ओर से कुटिल गमन करनेवाला है और जिसके हम लोग (आदिशाम्) सब प्रकार से दिये हुओं के (अरातीः) शत्रुओं का (तुर्याम) नाश करें और (राष्ट्री) ईश्वर जैसे वैसे न्याय में वर्त्ताव करें, उसका हम लोग सेवन करें ॥५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो शुद्ध खाने और पीने योग्य पदार्थ का सेवन करता है, वायु के सदृश बलिष्ठ और ईश्वर के सदृश पक्षपात से रहित होकर न्याय की अपेक्षा से विपरीत दशा को प्राप्त हुओं का मारनेवाला हो, उसी को राजा मानो ॥५॥