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Rigveda / 6 / 7 / 3

त्वद्विप्रो॑ जायते वा॒ज्य॑ग्ने॒ त्वद्वी॒रासो॑ अभिमाति॒षाहः॑। वैश्वा॑नर॒ त्वम॒स्मासु॑ धेहि॒ वसू॑नि राजन्त्स्पृह॒याय्या॑णि ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 7 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वत्। विप्रः॑। जा॒य॒ते॒। वा॒जी। अ॒ग्ने॒। त्वत्। वी॒रासः॑। अ॒भि॒मा॒ति॒ऽसहः॑। वैश्वा॑नर। त्वम्। अ॒स्मासु॑। धे॒हि॒। वसू॑नि। रा॒ज॒न्। स्पृ॒ह॒याय्या॑णि ॥३॥

पदार्थ : हे (वैश्वानर) संपूर्ण जनों में अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी विद्वन् (राजन्) राजन् ! जिस कारण से (त्वत्) आपके समीप से (विप्रः) बुद्धिमान् (वाजी) वेगयुक्त (जायते) होता है और (त्वत्) आपके समीप से (अभिमातिषाहः) अभिमानयुक्त शत्रुओं के सहनेवाले (वीरासः) शूरवीर जन प्रकट होते हैं इससे (त्वम्) आप (अस्मासु) हम लोगों में (स्पृहयाय्याणि) इच्छा के विषय होने योग्य (वसूनि) धनों को (धेहि) धारण करिये ॥३॥

भावार्थ : वही राजा होने को योग्य है जिसके सङ्ग दुष्ट जन भी श्रेष्ठ, कायर भी शूरवीर और कृपण भी दाता होते हैं ॥३॥