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Rigveda / 6 / 10 / 4

आ यः प॒प्रौ जाय॑मान उ॒र्वी दू॑रे॒दृशा॑ भा॒सा कृ॒ष्णाध्वा॑। अध॑ ब॒हु चि॒त्तम॒ ऊर्म्या॑यास्ति॒रः शो॒चिषा॑ ददृशे पाव॒कः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : आर्षीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। यः। प॒प्रौ। जाय॑मानः। उ॒र्वी इति॑। दू॒रे॒ऽदृशा॑। भा॒सा। कृ॒ष्णऽअ॑ध्वा। अध॑। ब॒हु। चि॒त्। तमः॑। ऊर्म्या॑याः। ति॒रः। शो॒चिषा॑। द॒दृ॒शे॒। पा॒व॒कः ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (जायमानः) प्रकट हुआ (कृष्णाध्वा) कर्षित किया अर्थात् जिसे हल से जोतें, वैसे पहियों से सतीरा मार्ग जिसने वह (दूरेदृशा) जिससे दूर देखते हैं उस (भासा) प्रकाश से (उर्वी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) चारों ओर से (पप्रौ) व्याप्त होता है और (अध) इसके अनन्तर (ऊर्म्यायाः) रात्रि का (बहु) बहुत (चित्) भी (तमः) अन्धकार (शोचिषा) प्रकाश से (तिरः) तिरस्कार करता है और (पावकः) पवित्रकर्त्ता हुआ (ददृशे) देखा जाता है, उसको आप लोग जानिये ॥४॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य बिजुलीरूप अग्नि को जानें ॥४॥