Rigveda / 6 / 10 / 6
इ॒मं य॒ज्ञं चनो॑ धा अग्न उ॒शन्यं त॑ आसा॒नो जु॑हु॒ते ह॒विष्मा॑न्। भ॒रद्वा॑जेषु दधिषे सुवृ॒क्तिमवी॒र्वाज॑स्य॒ गध्य॑स्य सा॒तौ ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 10 | Mantra No : 6
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : agniH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ima.m yaj~na.m chano dhaa agna ushanya.m ta aasaano juhute haviShmaan. bharadvaajeShu dadhiShe suvRRiktimaviirvaajasya gadhyasya saatau .6.
Component Words : imam. yaj~nam. chanaH. dhaaH. agne. ushan. yam. te. aasaanaH. juhute. haviShmaan. bharat.avaajeShu. dadhiShe. su.avRRiktim. aviiH. vaajasya. gadhyasya. saatau .6.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : इ॒मम्। य॒ज्ञम्। चनः॑। धाः॒। अ॒ग्ने॒। उ॒शन्। यम्। ते॒। आ॒सा॒नः। जु॒हु॒ते। ह॒विष्मा॑न्। भ॒रत्ऽवा॑जेषु। द॒धि॒षे॒। सु॒ऽवृ॒क्तिम्। अवीः॑। वाज॑स्य। गध्य॑स्य। सा॒तौ ॥६॥
पदार्थ : हे (अग्ने) पुरुषार्थी विद्वन् ! आप (यम्) जिस (यज्ञम्) परोपकारनामक यज्ञ की (उशन्) कामना करते हुए (चनः) अन्न आदि को (धाः) धारण करें और (आसानः) बैठे हुए (हविष्मान्) बहुत देने और भोग करने योग्य पदार्थ जिनमें वह आप (जुहुते) हवन करते हैं (इमम्) इसकी (गध्यस्य) अभिकाङ्क्षा करने योग्य (वाजस्य) विज्ञान आदि के (सातौ) संग्राम में (अवीः) रक्षा कीजिये और (भरद्वाजेषु) अन्न आदि को धारण करनेवालों में (सुवृक्तिम्) उत्तम प्रकार चलते हैं जिसमें उस मार्ग को (दधिषे) धारण कीजिये उन (ते) आपका सम्पूर्ण सुख सुगम होजाये ॥६॥
भावार्थ : जो परोपकार करते हैं, उनको ही अभीष्ट स्वार्थसिद्धि होती है ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनर्विद्वद्भिः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : इ॒मम्। य॒ज्ञम्। चनः॑। धाः॒। अ॒ग्ने॒। उ॒शन्। यम्। ते॒। आ॒सा॒नः। जु॒हु॒ते। ह॒विष्मा॑न्। भ॒रत्ऽवा॑जेषु। द॒धि॒षे॒। सु॒ऽवृ॒क्तिम्। अवीः॑। वाज॑स्य। गध्य॑स्य। सा॒तौ ॥६॥
पदार्थ : (इमम्) (यज्ञम्) परोपकाराख्यम् (चनः) अन्नादिकम् (धाः) धेहि (अग्ने) पुरुषार्थिन् विद्वन् (उशन्) कामयमानः (यम्) (ते) तव (आसानः) आसीनः (जुहुते) जुहोति (हविष्मान्) बहूनि हवींषि दातव्यानि भोक्तव्यानि विद्यन्ते येषु (भरद्वाजेषु) ये वाजानन्नादीन् भरन्ति तेषु (दधिषे) (सुवृक्तिम्) सुष्ठु व्रजन्ति यस्मिन्मार्गे तम् (अवीः) रक्षेः (वाजस्य) विज्ञानादेः (गध्यस्य) अभिकाङ्क्षितुं योग्यस्य (सातौ) सङ्ग्रामे ॥६॥
अन्वय : हे अग्ने ! त्वं यं यज्ञमुशञ्चनो धा आसानो हविष्मान्त्सम्भवाञ्जुहुत इमं गध्यस्य वाजस्य साताववीर्भरद्वाजेषु सुवृक्तिं दधिषे तस्य ते सर्वं सुखं सुगमं जायेत ॥६॥
भावार्थ : ये परोपकारं कुर्वन्ति तेषामेवाभीष्टा स्वार्थसिद्धिर्जायते ॥६॥