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Rigveda / 6 / 11 / 6

द॒श॒स्या नः॑ पुर्वणीक होतर्दे॒वेभि॑रग्ने अ॒ग्निभि॑रिधा॒नः। रा॒यः सू॑नो सहसो वावसा॒ना अति॑ स्रसेम वृ॒जनं॒ नांहः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 11 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : दृ॒श॒स्य। नः॒। पु॒रु॒ऽअ॒णी॒क॒। हो॒तः॒। दे॒वेभिः॑। अ॒ग्ने॒। अ॒ग्निऽभिः॑। इ॒धा॒नः। रा॒यः। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। व॒व॒सा॒नाः। अति॑। स्र॒से॒म॒। वृ॒जन॑म्। न। अंहः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (पुर्वणीक) अनेक सेनाओं से युक्त (होतः) दान करनेवाले (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान राजन् ! (देवेभिः) निरन्तर प्रकाशमान (अग्निभिः) अग्नि के समान वर्त्तमान वीरजनों से (इधानः) प्रकाशमान अग्नि जैसे वैसे आप (नः) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (दशस्या) देते हैं जिससे वह दशस् है उस अपने की इच्छा करिये, जिससे (वावसानाः) ढाँपे गये हम लोग (वृजनम्) वर्जने योग्य बल को (न) जैसे वैसे (अंहः) अपराध को (अति) (स्रसेम) अतिक्रमण करें ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि इन्धनों से बढ़ता है, वैसे आप लोग पुरुषार्थ से बढ़िये और जैसे मनुष्य शत्रु का शीघ्र त्याग करते हैं, वैसे अन्यायाचरणरूप पाप का शीघ्र त्याग करो ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह ग्यारहवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥