Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 13 / 3

स सत्प॑तिः॒ शव॑सा हन्ति वृ॒त्रमग्ने॒ विप्रो॒ वि प॒णेर्भ॑र्ति॒ वाज॑म्। यं त्वं प्र॑चेत ऋतजात रा॒या स॒जोषा॒ नप्त्रा॒पां हि॒नोषि॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 13 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् जन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। सत्ऽप॑तिः। शव॑सा। ह॒न्ति॒। वृ॒त्रम्। अ॒ग्ने॒। विप्रः॑। वि। प॒णेः। भ॒र्ति॒। वाज॑म्। यम्। त्वम्। प्र॒ऽचे॒तः॒। ऋ॒त॒ऽजा॒त॒। रा॒या। स॒ऽजोषाः॑। नप्त्रा॑। अ॒पाम्। हि॒नोषि॑ ॥३॥

पदार्थ : हे (ऋतजात) सत्य में प्रकट होनेवाले (प्रचेतः) अच्छे ज्ञान से युक्त (अग्ने) प्रकाशस्वरूप (विप्रः) बुद्धिमान् जन (त्वम्) आप जैसे (सत्पतिः) जल का पालक सूर्य्य (शवसा) बल से (वृत्रम्) मेघ का (हन्ति) नाश करता है और (पणेः) व्यवहारकर्त्ता के (वाजम्) अन्न वा विज्ञान को (वि, भर्ति) विशेष कर धारण करता है, वैसे (यम्) जिसको (सजोषाः) तुल्य प्रीति से सेवन करनेवाले आप (राया) धन से (अपाम्) जलों के (नप्त्रा) नहीं गिरनेवाले के साथ (हिनोषि) वृद्धि करे हो (सः) सो यह सब प्रकार से वृद्धि को प्राप्त होता है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बुद्धिमान् जन सूर्य्य के सदृश विद्या को प्रकाशित करके अविद्या का नाश करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥३॥