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Rigveda / 6 / 14 / 4

अ॒ग्निर॒प्सामृ॑ती॒षहं॑ वी॒रं द॑दाति॒ सत्प॑तिम्। यस्य॒ त्रस॑न्ति॒ शव॑सः सं॒चक्षि॒ शत्र॑वो भि॒या ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 14 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उत्तम मनुष्य क्या करता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निः। अ॒प्साम्। ऋ॒ति॒ऽसह॑म्। वी॒रम्। द॒दा॒ति॒। सत्ऽप॑तिम्। यस्य॑। त्रस॑न्ति। शव॑सः। स॒म्ऽचक्षि॑। शत्र॑वः। भि॒या ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसके (शवसः) बल से (सञ्चक्षि) सम्मुख (भिया) भय से (शत्रवः) शत्रुजन (त्रसन्ति) व्याकुल होते हैं वह (अग्निः) बड़ा बलिष्ठ वीर पुरुष (अप्साम्) श्रेष्ठ कर्म्मों के विभाग करने और (ऋतीषहम्) दूसरे के पदार्थों के प्राप्त करानेवाले शत्रुओं को सहनकर्त्ता (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालक (वीरम्) वीर पुरुष को (ददाति) देता है ॥४॥

भावार्थ : जो ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय और विद्वान् होकर शरीर और आत्मा के सामर्थ्य को नहीं दूर करते हैं, उनसे शत्रुजन डर के भागते हैं अथवा वश को प्राप्त होते हैं ॥४॥