Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 15 / 17

इ॒ममु॒ त्यम॑थर्व॒वद॒ग्निं म॑न्थन्ति वे॒धसः॑। यम॑ङ्कू॒यन्त॒मान॑य॒न्नमू॑रं श्या॒व्या॑भ्यः ॥१७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 15 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर बिजुली को किससे निकालें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒मम्। ऊँ॒ इति॑। त्यम्। अ॒थ॒र्व॒ऽवत्। अ॒ग्निम्। म॒न्थ॒न्ति॒। वे॒धसः॑। यम्। अ॒ङ्कु॒ऽयन्त॑म्। आ। अन॑यन्। अमू॑रम्। श्या॒व्या॑भ्यः ॥१७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (वेधसः) बुद्धिमान् विद्वान् जन (श्याव्याभ्यः) रात्रियों में हुई क्रियाओं से (यम्) जिस (अङ्कूयन्तम्) प्रसिद्ध चिह्न प्राप्त होते जिसमें (इमम्) इस (उ) और (त्यम्) जो नहीं प्रत्यक्ष हुआ उस (अग्निम्) बिजुलीरूप अग्नि का (अथर्ववत्) जैसा अथर्ववेद में मन्थन कहा है, वैसे (अमूरम्) मूढ़ से भिन्न का (मन्थन्ति) मन्थन करते और कार्य्य की सिद्धि को (आ, अनयन्) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं, उसका आप लोग भी मन्थन करके कार्य्यों को सिद्ध करिये ॥१७॥

भावार्थ : जो विद्वान् जन भूमि, अन्तरिक्ष, वायु, आकाश और सूर्य्य आदि से मन्थन करके बिजुली को निकालते हैं, वे अनेक कार्य्यों के सिद्ध करने को समर्थ होते हैं ॥१७॥