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Rigveda / 6 / 17 / 6

तव॒ क्रत्वा॒ तव॒ तद्दं॒सना॑भिरा॒मासु॑ प॒क्वं शच्या॒ नि दी॑धः। और्णो॒र्दुर॑ उ॒स्रिया॑भ्यो॒ वि दृ॒ळ्होदू॒र्वाद्गा अ॑सृजो॒ अङ्गि॑रस्वान् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 17 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तव॑। क्रत्वा॑। तव॑। तत्। दं॒सना॑भिः। आ॒मासु॑। प॒क्वम्। शच्या॑। नि। दी॒ध॒रिति॑ दीधः। और्णोः॑। दुरः॑। उ॒स्रिया॑भ्यः। वि। दृ॒ळ्हा। उत्। ऊ॒र्वात्। गाः। अ॒सृ॒जः॒। अङ्गि॑रस्वान् ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (तव) आपकी (क्रत्वा) बुद्धि से और (तव) आपके (दंसनाभिः) कर्म्मों से हम लोग (आमासु) नहीं पाकदशा को प्राप्त हुओं में (तत्) उस (पक्वम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त विज्ञान को प्राप्त होवें और आप इस को (शच्या) बुद्धि वा प्रजा से (नि, दीधः) धारण कराते हो और जो (उस्रियाभ्यः) किरणों से (दुरः) गृहद्वारों को (और्णोः) आच्छादित करे तथा (ऊर्वात्) हिंसन से (गाः) भूमियों को (उत्, असृजः) अच्छे प्रकार रचे और (अङ्गिरस्वान्) बहुत प्रकार के प्राण विद्यमान जिसमें वह (दृळ्हा) दृढ़ों को (वि) विशेष करके रचे उसका हम लोग सत्कार करें ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त होकर सब का सत्कार करते हैं, वे राज्य को प्राप्त होकर सूर्य्य के सदृश प्रकाशित होते हैं ॥६॥