Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 17 / 9

अध॒ द्यौश्चि॑त्ते॒ अप॒ सा नु वज्रा॑द्द्वि॒तान॑मद्भि॒यसा॒ स्वस्य॑ म॒न्योः। अहिं॒ यदिन्द्रो॑ अ॒भ्योह॑सानं॒ नि चि॑द्वि॒श्वायुः॑ श॒यथे॑ ज॒घान॑ ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 17 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। द्यौः। चि॒त्। ते॒। अप॑। सा। नु। वज्रा॑त्। द्वि॒ता। अ॒न॒म॒त्। भि॒यसा॑। स्वस्य॑। म॒न्योः। अहि॑म्। यत्। इन्द्रः॑। अ॒भि। ओह॑सानम्। नि। चि॒त्। वि॒श्वऽआ॑युः। श॒यथे॑। ज॒घान॑ ॥९॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यत्) जो (इन्द्रः) सूर्य्य (ओहसानम्) तर्क से जानने योग्य (अहिम्) मेघ का (अभि) सब ओर से (जघान) नाश करता है, वैसे जो (चित्) कोई (विश्वायुः) सम्पूर्ण अवस्था से युक्त (नि) निरन्तर (शयथे) शयन करता है (अध) इसके अनन्तर जो (द्यौः) कामना करती हुई (चित्) भी (वज्रात्) बिजुली के प्रहार से (भियसा) भय से (द्विता) दो प्रकार (अनमत्) नमती है, वैसे हे विद्वन् ! (स्वस्य) अपने (मन्योः) क्रोध से (सा) वह (नु) निश्चय से (ते) आपका दुःख (अप) दूर करे ॥९॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोग सूर्य्य और मेघ सदृश वर्त्ताव करके परस्पर पालन करो ॥९॥