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Rigveda / 6 / 18 / 3

त्वं ह॒ नु त्यद॑दमयो॒ दस्यूँ॒रेकः॑ कृ॒ष्टीर॑वनो॒रार्या॑य। अस्ति॑ स्वि॒न्नु वी॒र्यं१॒॑ तत्त॑ इन्द्र॒ न स्वि॑दस्ति॒ तदृ॑तु॒था वि वो॑चः ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 18 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। ह॒। नु। त्यत्। अ॒द॒म॒यः॒। दस्यू॑न्। एकः॑। कृ॒ष्टीः। अ॒व॒नोः॒। आर्या॑य। अस्ति॑। स्वि॒त्। नु। वी॒र्य॑म्। तत्। ते॒। इ॒न्द्र॒। न। स्वि॑त्। अ॒स्ति॒। तत्। ऋ॒तु॒ऽथा। वि। वो॒चः॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् ! जो (ते) आप का (वीर्य्यम्) बल (अस्ति) है (स्वित्) क्या? (नु) शीघ्र जो (न) नहीं (अस्ति) है और (स्वित्) भी (ऋतुथा) ऋतु जैसे वैसे जो (वि, वोचः) कहते हो (तत्) उसका (त्वम्) आप (अवनोः) सेवन करिये (तत्) वह मेरा हो और (दस्यून्) दुष्ट चोरों को (एकः) सहायरहित हुए आप (अदमयः) दमन करिये वह आप (ह) निश्चय (कृष्टीः) मनुष्यों को (आर्य्याय) द्विज के लिये (नु) शीघ्र उत्तम प्रकार सेवन करिये (त्यत्) उसको हम लोग भी ऐसे करें ॥३॥

भावार्थ : राजाओं का यह मुख्य कर्म्म है कि सम्पूर्ण दुष्ट चोरों का निवारण करके प्रजाओं का पालन करें ॥३॥