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Rigveda / 6 / 18 / 10

अ॒ग्निर्न शुष्कं॒ वन॑मिन्द्र हे॒ती रक्षो॒ नि ध॑क्ष्य॒शनि॒र्न भी॒मा। ग॒म्भी॒रय॑ ऋ॒ष्वया॒ यो रु॒रोजाध्वा॑नयद्दुरि॒ता द॒म्भय॑च्च ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 18 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निः। न। शुष्क॑म्। वन॑म्। इ॒न्द्र॒। हे॒ती। रक्षः॑। नि। ध॒क्षि॒। अ॒शनिः॑। न। भी॒मा। ग॒म्भी॒रया॑। ऋ॒ष्वया॑। यः। रु॒रोज॑। अध्व॑नयत्। दुः॒ऽइ॒ता। द॒म्भय॑त्। च॒ ॥१०॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुष्टता के नाशक राजन् ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि जैसे (शुष्कम्) सूखे (वनम्) वन को (न) वैसे (रक्षः) दुष्ट जन को (धक्षि) जलाते हो और जिन आपका (हेतिः) वज्र (अशनिः) बिजुली (न) जैसे वैसे (भीमा) जिनसे जन भय करते वह सेना है उस (ऋष्वया) बड़ी (गम्भीरया) अथाह बलयुक्त सेना से आप शत्रुओं को (रुरोज) रोगयुक्त करते हो उसको (अध्वानयत्) कंपाते हो और (दुरिता) दुष्ट आचरणों को (च) भी (दम्भयत्) नष्ट करते हो उससे जिस कारण दुष्टजन को (नि) अत्यन्त जलाते हो, इससे अपराजित हो ॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि जनो ! जैसे अग्नि ज्वाला से सूखे और गीले भी वन को जलाता है, वैसे उत्तम प्रकार शिक्षित तथा बड़ी सेना से शत्रुओं को भय करिये और शत्रुओं को जलाइये ॥१०॥