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Rigveda / 6 / 21 / 6

तं पृ॒च्छन्तोऽव॑रासः॒ परा॑णि प्र॒त्ना त॑ इन्द्र॒ श्रुत्यानु॑ येमुः। अर्चा॑मसि वीर ब्रह्मवाहो॒ यादे॒व वि॒द्म तात्त्वा॑ म॒हान्त॑म् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 21 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तम्। पृ॒च्छन्तः॑। अव॑रासः। परा॑णि। प्र॒त्ना। ते॒। इ॒न्द्र॒। श्रुत्या॑। अनु॑। ये॒मुः॒। अर्चा॑मसि। वी॒र॒। ब्र॒ह्म॒ऽवाहः॑। यात्। ए॒व। वि॒द्म। तात्। त्वा॒। म॒हान्त॑म् ॥६॥

पदार्थ : हे (वीर) शूरता आदि गुणों से युक्त (इन्द्र) विद्वन् ! जो (अवरासः) आधुनिक जिज्ञासु अर्थात् ब्रह्म को जानने की इच्छा करनेवाले जन (तम्) उन (महान्तम्) महाशय (त्वा) आपको (पृच्छन्तः) पूँछते हुए हैं (ते) वे (पराणि) उत्तरकाल में वर्त्तमान और (प्रत्ना) पूर्वकाल में स्थित (श्रुत्या) वेद में प्रतिपादित विषयों को (अनु, येमुः) अनुकूल नियम में लाते हैं, उनका हम लोग (अर्चामसि) सत्कार करते हैं और हे (ब्रह्मवाहः) धन और धान्य को प्राप्त करानेवाले विद्वान् ! हम लोग (यात्) जितनों को (विद्म) जानें (तात्) उतनों (एव) ही को आप लोग जानिये ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोगों को मित्रतापूर्वक मेल कर तथा पूर्व और पर विज्ञानों को प्राप्त होकर अत्यन्त सुख को प्राप्त होना चाहिये ॥६॥