Rigveda / 6 / 22 / 5
तं पृ॒च्छन्ती॒ वज्र॑हस्तं रथे॒ष्ठामिन्द्रं॒ वेपी॒ वक्व॑री॒ यस्य॒ नू गीः। तु॒वि॒ग्रा॒भं तु॑विकू॒र्मिं र॑भो॒दां गा॒तुमि॑षे॒ नक्ष॑ते॒ तुम्र॒मच्छ॑ ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 22 | Mantra No : 5
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ta.m pRRichChantii vajrahasta.m ratheShThaamindra.m vepii vakvarii yasya nuu giiH. tuvigraabha.m tuvikuurmi.m rabhodaa.m gaatumiShe nakShate tumramachCha .5.
Component Words : tam. pRRichChantii. vajra.ahastam. rathe.asthaam. indram. vepii. vakvarii. yasya. nu. giiH. tuvi.agraabham. tuvi.akuurmim. rabhaH.adaam. gaatum. iShe. nakShate. tumram. achCha .5.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर स्त्री कैसे पति का ग्रहण करे, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : तम्। पृ॒च्छन्ती॑। वज्र॑ऽहस्तम्। र॒थे॒ऽस्थाम्। इन्द्र॑म्। वेपी॑। वक्व॑री। यस्य॑। नु। गीः। तु॒वि॒ऽग्रा॒भम्। तु॒वि॒ऽकू॒र्मिम्। र॒भः॒ऽदाम्। गा॒तुम्। इ॒षे॒। नक्ष॑ते। तुम्र॑म्। अच्छ॑ ॥५॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसके (इषे) अन्न आदि के लिये (गीः) वाणी (तुविग्राभम्) बहुतों को ग्रहण करने (तुविकूर्मिम्) बहुत कामों के करने और (रभोदाम्) वेग से युक्त बल के देनेवाले (तुम्रम्) ग्लानि से युक्त जन को और (गातुम्) भूमि को (अच्छ) अच्छे प्रकार (नक्षते) प्राप्त होती है (तम्) उस (वज्रहस्तम्) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त हाथोंवाले (रथेष्ठाम्) रथ में स्थित होते हुए (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवान् पुरुष को (पृच्छन्ती) पूँछती हुई (वेपी) बुद्धिवाली और (वक्वरी) वचन-शक्ति वाली स्त्री (नू) निश्चय होवे, उसका हम लोग भी आश्रयण करें ॥५॥
भावार्थ : कन्या को चाहिये कि सब बातों को पूँछ कर हृदयप्रिय पति को स्वीकार करे ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनः स्त्री कीदृशं पतिं गृह्णीयादित्याह ॥
पदपाठ : तम्। पृ॒च्छन्ती॑। वज्र॑ऽहस्तम्। र॒थे॒ऽस्थाम्। इन्द्र॑म्। वेपी॑। वक्व॑री। यस्य॑। नु। गीः। तु॒वि॒ऽग्रा॒भम्। तु॒वि॒ऽकू॒र्मिम्। र॒भः॒ऽदाम्। गा॒तुम्। इ॒षे॒। नक्ष॑ते। तुम्र॑म्। अच्छ॑ ॥५॥
पदार्थ : (तम्) (पृच्छन्ती) (वज्रहस्तम्) शस्त्राऽस्त्रपाणिम् (रथेष्ठाम्) रथे तिष्ठन्तम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (वेपी) धीमती (वक्वरी) वचनशक्तिमती (यस्य) (नू) (गीः) वाक् (तुविग्राभम्) बहूनां ग्रहीतारम् (तुविकूर्मिम्) बहुकर्माणम् (रभोदाम्) वेगयुक्तबलस्य दातारम् (गातुम्) भूमिम् (इषे) अन्नाद्याय (नक्षते) प्राप्नोति। नक्षतिर्गतिकर्मा। (निघं०२.१४) (तुम्रम्) ग्लातारम् (अच्छ) ॥५॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यस्येषे गीस्तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां तुम्रं गातुमच्छा नक्षते तं वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं पृच्छन्ती वेपी वक्वरी नू स्यात्तं वयमप्याश्रयेम ॥५॥
भावार्थ : कन्यया सर्वा वार्ताः पृष्ट्वा हृद्यः पतिः स्वीकर्त्तव्यः ॥५॥