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Rigveda / 6 / 22 / 7

तं वो॑ धि॒या नव्य॑स्या॒ शवि॑ष्ठं प्र॒त्नं प्र॑त्न॒वत्प॑रितंस॒यध्यै॑। स नो॑ वक्षदनिमा॒नः सु॒वह्मेन्द्रो॒ विश्वा॒न्यति॑ दु॒र्गहा॑णि ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 22 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्यों को किसका नित्य ध्यान करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तम्। वः॒। धि॒या। नव्य॑स्या। शवि॑ष्ठम्। प्र॒त्नम्। प्र॒त्न॒ऽवत्। प॒रि॒ऽतं॒स॒यध्यै॑। सः। नः॒। व॒क्ष॒त्। अ॒नि॒ऽमा॒नः। सु॒ऽवह्मा॑। इन्द्रः॑। विश्वा॑नि। अति॑। दुः॒ऽगहा॑णि ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अनिमानः) परिमाण से रहित (सुवह्मा) उत्तम प्रकार चलानेवाला (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर (नव्यस्या) अतिशय नवीन (धिया) बुद्धि वा कर्म से (वः) आप लोगों और (नः) हम लोगों के लिये (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुर्गहाणि) दुःख से प्राप्त होने योग्यों को नाश करनेवाले धर्मयुक्त कर्मों को (परितंसयध्यै) चारों ओर से सुशोभा करने के लिये (अति, वक्षत्) अत्यन्त प्राप्त करावे (तम्) उस (शविष्ठम्) अत्यन्त बलवान् (प्रत्नम्) पुरातन को (प्रत्नवत्) प्राचीन के सदृश मान कर हम लोग सेवा करें और (सः) वह भी हम लोग का गुरु हो ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो परमात्मा हम सब लोगों के सम्पूर्ण दुःखों को बुद्धिदान से दूर करके अधर्माचरण से संकोचित करता है, उस परमात्मा का आत्मा से निरन्तर ध्यान करो ॥७॥