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Rigveda / 6 / 23 / 6

ब्रह्मा॑णि॒ हि च॑कृ॒षे वर्ध॑नानि॒ ताव॑त्त इन्द्र म॒तिभि॑र्विविष्मः। सु॒ते सोमे॑ सुतपाः॒ शंत॑मानि॒ रान्द्र्या॑ क्रियास्म॒ वक्ष॑णानि य॒ज्ञैः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 23 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ब्रह्मा॑णि। हि। च॒कृ॒षे। वर्ध॑नानि। ताव॑त्। ते॒। इ॒न्द्र॒। म॒तिऽभिः॑। वि॒वि॒ष्मः॒। सु॒ते। सोमे॑। सु॒त॒ऽपाः॒। शम्ऽत॑मानि। रान्द्र्या॑। क्रि॒या॒स्म॒। वक्ष॑णानि। य॒ज्ञैः ॥६॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) प्रतापयुक्त ! जितने (वर्धनानि) वृद्धि करनेवाले (ब्रह्माणि) धनों को आप (चकृषे) करते हो (तावत्) उतने (ते) आपके लिये (मतिभिः) उत्तम मनुष्यों के साथ हम लोग (विविष्मः) व्याप्त होवें तथा (सुतपाः) पदार्थों की रक्षा करनेवाला तथा (हि) निश्चय कर हम लोग (सुते) उत्पन्न हुए (सोमे) ऐश्वर्य में (यज्ञैः) धनप्रापक व्यवहारों से निश्चय कर (शन्तमानि) अत्यन्त सुखकारक (रान्द्र्या) रमण करने योग्यों को (वक्षणानि) प्राप्त करानेवाले (क्रियास्म) करें ॥६॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम आचरण को देख के वैसा ही आचरण करें और सब मिल के ऐश्वर्य को प्राप्त होकर न्याय से प्रजा की रक्षा करें ॥६॥