Rigveda / 6 / 26 / 4
त्वं रथं॒ प्र भ॑रो यो॒धमृ॒ष्वमावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम्। त्वं तुग्रं॑ वेत॒सवे॒ सचा॑ह॒न्त्वं तुजिं॑ गृ॒णन्त॑मिन्द्र तूतोः ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 26 | Mantra No : 4
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tva.m ratha.m pra bharo yodhamRRiShvamaavo yudhyanta.m vRRiShabha.m dashadyum. tva.m tugra.m vetasave sachaahantva.m tuji.m gRRiNantamindra tuutoH .4.
Component Words : tvam. ratham. pra. bharaH. yodham. RRIShvam. aavaH. yudhyantam. vRRiShabham. dasha.adyum. tvam. tugram. vetasave. sachaa. ahan. tvam. tujim. gRRiNantam. indra. tuutoriti tuutoH .4.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : त्वम्। रथ॑म्। प्र। भ॒रः॒। यो॒धम्। ऋ॒ष्वम्। आवः॑। युध्य॑न्तम्। वृ॒ष॒भम्। दश॑ऽद्युम्। त्वम्। तुग्र॑म्। वे॒त॒सवे॑। सचा॑। अ॒ह॒न्। त्वम्। तुजि॑म्। गृ॒णन्त॑म्। इ॒न्द्र॒। तू॒तो॒रिति॑ तूतोः ॥४॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) सेना के स्वामिन् ! (त्वम्) आप (रथम्) सुन्दर वाहन को (प्र, भरः) धारण करिये तथा (वृषभम्) बलिष्ठ (दशद्युम्) दश अंगुलियों से प्रकाश देनेवाले और (योधम्) युद्ध करनेवाले से (युध्यन्तम्) युद्ध करते हुए (ऋष्वम्) बड़े की (आवः) रक्षा करिये और (त्वम्) आप (वेतसवे) व्याप्त ऐश्वर्यवाले में (सचा) सम्बन्ध से (तुग्रम्) तेजस्वी को (अहन्) दूर करिये और (त्वम्) आप (गृणन्तम्) स्तुति करते हुए (तुजिम्) बलिष्ठ को (तूतोः) बढ़ाइये ॥४॥
भावार्थ : जो राजा रथ और युद्धकुशल वीरों को बढ़ाता है, वह अत्यन्त सुख को प्राप्त होता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : त्वम्। रथ॑म्। प्र। भ॒रः॒। यो॒धम्। ऋ॒ष्वम्। आवः॑। युध्य॑न्तम्। वृ॒ष॒भम्। दश॑ऽद्युम्। त्वम्। तुग्र॑म्। वे॒त॒सवे॑। सचा॑। अ॒ह॒न्। त्वम्। तुजि॑म्। गृ॒णन्त॑म्। इ॒न्द्र॒। तू॒तो॒रिति॑ तूतोः ॥४॥
पदार्थ : (त्वम्) (रथम्) रमणीयं यानम् (प्र) (भरः) धर (योधम्) युद्धकर्तारम् (ऋष्वम्) महान्तम् (आवः) रक्ष (युध्यन्तम्) (वृषभम्) बलिष्ठम् (दशद्युम्) दशभिरङ्गुलिभिः प्रकाशप्रदम् (त्वम्) (तुग्रम्) तेजस्विनम् (वेतसवे) व्याप्तैश्वर्ये (सचा) सम्बन्धेन (अहन्) (त्वम्) (तुजिम्) बलिष्ठम् (गृणन्तम्) स्तुवन्तम् (इन्द्र) सेनाध्यक्ष (तूतोः) वर्धय ॥४॥
अन्वय : हे इन्द्र ! त्वं रथं प्र भरो वृषभं दशद्युं योधं युध्यन्तमृष्वमावस्त्वं वेतसवे सचा तुग्रमहंस्त्वं गृणन्तं तुजिं तूतोः ॥४॥
भावार्थ : यो राजा रथं युद्धकुशलान् वीराँश्च वर्धयति स महत्सुखमाप्नोति ॥४॥