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Rigveda / 1 / 38 / 10

अध॑ स्व॒नान्म॒रुतां॒ विश्व॒मा सद्म॒ पार्थि॑वम् । अरे॑जन्त॒ प्र मानु॑षाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 38 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : मरूतः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर इन पवनों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अध॑ । स्व॒नात् । म॒रुताम् । विश्व॑म् । आ । सद्म॑ । पार्थि॑वम् । अरे॑जन्त । प्र । मानु॑षाः॥

पदार्थ : हे (मानुषाः) मननशील मनुष्यो ! तुम जिन (मरुताम्) पवनों के (स्वनात्) उत्पन्न शब्द के होने से (अध) अनन्तर (विश्वम्) सब (पार्थिवम्) पृथिवी में विदित वस्तुमात्र का (सद्म) स्थान कंपता और प्राणिमात्र (अरेजन्त) अच्छे प्रकार कंपित होते हैं इस प्रकार जानो ॥१०॥

भावार्थ : हे ज्योतिष्य शास्त्र के विद्वान लोगो ! आप पवनों के योग ही के सब मूर्त्तिमान् द्रव्य चेष्टा को प्राप्त होते प्राणी लोग बिजुली के भयंकर शब्द में भय को प्राप्त होकर कंपित होते और भूगोल आदि प्रतिक्षण भ्रमण किया करते हैं ऐसा निश्चित समझों ॥१०॥