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Rigveda / 6 / 27 / 3

न॒हि नु ते॑ महि॒मनः॑ समस्य॒ न म॑घवन्मघव॒त्त्वस्य॑ वि॒द्म। न राध॑सोराधसो॒ नूत॑न॒स्येन्द्र॒ नकि॑र्ददृश इन्द्रि॒यं ते॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 27 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को किसका ध्यान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : न॒हि। नु। ते॒। म॒हि॒मनः॑। स॒म॒स्य॒। न। म॒घ॒ऽव॒न्। म॒घ॒व॒त्ऽत्वस्य॑। वि॒द्म। न। राध॑सःऽराधसः। नूत॑नस्य। इन्द्र॑। नकिः॑। द॒दृ॒शे॒। इ॒न्द्रि॒यम्। ते॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (मघवन्) न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले ! जिन (ते) आपकी (महिमनः) महिमा का और (समस्य) तुल्यता का कोई (नु) भी (नहि) नहीं (ददृशे) देखा जाता है तथा हम लोग (मघवत्त्वस्य) बहुत धन से युक्तपने के तुल्य कुछ भी (न) नहीं (विद्म) जानें और (नूतनस्य) नवीन (राधसोराधसः) धन-धन के तुल्य (नकिः) नहीं देखा जाता है और (ते) आपका (इन्द्रियम्) इन्द्रिय (न) नहीं देखा जाता है, उनकी उपासना को हम लोग करें ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिसकी महिमा के समान महिमा, ऐश्वर्यसामर्थ्य के समान सामर्थ्य और स्वरूप नहीं विद्यमान है, उसी सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, जगदीश्वर का निरन्तर ध्यान करो ॥३॥