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Rigveda / 6 / 27 / 6

त्रिं॒शच्छ॑तं व॒र्मिण॑ इन्द्र सा॒कं य॒व्याव॑त्यां पुरुहूत श्रव॒स्या। वृ॒चीव॑न्तः॒ शर॑वे॒ पत्य॑मानाः॒ पात्रा॑ भिन्दा॒ना न्य॒र्थान्या॑यन् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 27 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ब्राह्म्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्रिं॒शत्ऽश॑तम्। व॒र्मिणः॑। इ॒न्द्र॒। सा॒कम्। य॒व्याऽव॑त्याम्। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। श्र॒व॒स्या। वृ॒चीव॑न्तः। शर॑वे। पत्य॑मानाः। पात्रा॑। भि॒न्दा॒नाः। नि॒ऽअ॒र्थानि॑। आ॒य॒न् ॥६॥

पदार्थ : (पुरुहूत) बहुतों से स्तुति किये गये (इन्द्र) सेना के स्वामिन् ! (त्रिंशच्छतम्) तीस सैकड़े (वर्मिणः) कवच को धारण किये हुए (वृचीवन्तः) रोग से आच्छादित करते हुए (शरवे) हिंसन के लिये (पात्रा) शत्रुओं के वाहनों को (भिन्दानाः) विदीर्ण करते और (पत्यमानाः) पति के सदृश आचरण करते हुए (साकम्) साथ (यव्यावत्याम्) यवों से बने पदार्थों के पाक जिसमें उस सेना में सब लोग (श्रवस्या) अन्त में होनेवाले (न्यर्थानि) निश्चित अर्थ जिनमें उन प्रयोजनों को नहीं (आयन्) प्राप्त होते हैं, उनका आप सत्कार करिये ॥६॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो वीरपुरुष, राजविद्या में निपुण, कार्यों के आरम्भ में दृढ़प्रयोजन सिद्धवस्त्रोंवाले होवें, वे आपसे सेना में सत्कारपूर्वक रखने योग्य हैं ॥६॥