Rigveda / 6 / 28 / 4
न ता अर्वा॑ रे॒णुक॑काटो अश्नुते॒ न सं॑स्कृत॒त्रमुप॑ यन्ति॒ ता अ॒भि। उ॒रु॒गा॒यमभ॑यं॒ तस्य॒ ता अनु॒ गावो॒ मर्त॑स्य॒ वि च॑रन्ति॒ यज्व॑नः ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 28 | Mantra No : 4
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : gaavaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : na taa arvaa reNukakaaTo ashnute na sa.mskRRitatramupa yanti taa abhi. urugaayamabhaya.m tasya taa anu gaavo martasya vi charanti yajvanaH .4.
Component Words : na. taaH. arvaa. reNu.akakaaTaH. ashnute. na. sa.mskRRita.atram. upa. yanti. taaH. abhi. uru.agaayam. abhayam. tasya. taaH. anu. gaavaH. martasya. vi. charanti. yajvanaH .4.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : गावः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : वह विद्या किस को प्राप्त होती और किस को नहीं प्राप्त होती है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : न। ताः। अर्वा॑। रे॒णुऽक॑काटः। अ॒श्नु॒ते॒। न। सं॒स्कृ॒त॒ऽत्रम्। उप॑। य॒न्ति॒। ताः। अ॒भि। उ॒रु॒ऽगा॒यम्। अभ॑यम्। तस्य॑। ताः। अनु॑। गावः॑। मर्त॑स्य। वि। च॒र॒न्ति॒। यज्व॑नः ॥४॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ताः) उन विद्याओं को (रेणुककाटः) रेणुकाओं के कूप के समान अन्धकार हृदयवाला (अर्वा) घोड़े के समान बुद्धिहीन विषयासक्त जन (न) नहीं (अश्नुते) प्राप्त होता है और मूढ़जन (संस्कृत्रम्) संस्कारयुक्त की रक्षा करनेवाले को प्राप्त होकर (ताः) उनके (न) नहीं (अभि) सन्मुख (उप, यन्ति) समीप प्राप्त होते हैं, किन्तु वे (उरुगायम्) बहुतों से प्रशंसनीय (अभयम्) निर्भय जन के सम्मुख समीप प्राप्त होती हैं और (ताः) वे विद्यायें (गावः) किरणों के समान (तस्य) उस (यज्वनः) विद्वानों के सेवक और प्राप्त होते हुए (मर्त्तस्य) विचारशील मनुष्य के (अनु, वि, चरन्ति) पश्चात् चलती हैं तथा विशेष करके प्राप्त होती हैं ॥४॥
भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अशुद्ध व्यवहार और विहार करनेवाले, लम्पट, चुगुल और कुसङ्गी हैं, उनको विद्या कभी नहीं प्राप्त होती है और जो पवित्र आहार और विहार करनेवाले, जितेन्द्रिय, यथार्थवक्ता, सत्सङ्गी, पुरुषार्थी हैं, उनको विद्या प्राप्त होती है, ऐसा जानिये ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : गावः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : सा विद्या कं प्राप्नोति कं न प्राप्नोतीत्याह ॥
पदपाठ : न। ताः। अर्वा॑। रे॒णुऽक॑काटः। अ॒श्नु॒ते॒। न। सं॒स्कृ॒त॒ऽत्रम्। उप॑। य॒न्ति॒। ताः। अ॒भि। उ॒रु॒ऽगा॒यम्। अभ॑यम्। तस्य॑। ताः। अनु॑। गावः॑। मर्त॑स्य। वि। च॒र॒न्ति॒। यज्व॑नः ॥४॥
पदार्थ : (न) निषेधे (ताः) (अर्वा) अश्व इव बुद्धिहीनो विषयासक्तः (रेणुककाटः) रेणुकाकूप इवान्धकारहृदयः (अश्नुते) प्राप्नोति (न) (संकृतत्रम्) यः संस्कृतं त्रायते रक्षति तम् (उप) (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (ताः) (अभि) आभिमुख्ये (उरुगायम्) बहुभिः प्रशंसनीयम् (अभयम्) अविद्यमानं भयं यस्य यस्माद्वा (तस्य) (ताः) (अनु) (गावः) किरणा इव (मर्त्तस्य) मननशीलस्य नरस्य (वि) (चरन्ति) (यज्वनः) विदुषां सेवकस्य सङ्गच्छमानस्य ॥४॥
अन्वय : हे मनुष्यास्ता रेणुककाटोऽर्वा नाश्नुते मूढाः संस्कृतत्रं प्राप्य ता नाऽभ्युप यन्ति किन्तु ता उरुगायमभयं जनमभ्युपयन्ति ता गाव इव तस्य यज्वनो मर्त्तस्यानु वि चरन्ति विशेषेण प्राप्नुवन्ति ॥४॥
भावार्थ : हे मनुष्या ! येऽशुद्धाहाराविहारा लम्पटाः पिशुनाः कुसङ्गिनः सन्ति तान् विद्या कदाचिदपि नाप्नोति ये च पवित्राहारविहारा जितेन्द्रिया यथार्थवक्तारः सत्सङ्गिनः पुरुषार्थिनः सन्ति तान् विद्याऽभिगच्छतीति विजानीत ॥४॥