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Rigveda / 6 / 28 / 6

यू॒यं गा॑वो मेदयथा कृ॒शं चि॑दश्री॒रं चि॑त्कृणुथा सु॒प्रती॑कम्। भ॒द्रं गृ॒हं कृ॑णुथ भद्रवाचो बृ॒हद्वो॒ वय॑ उच्यते स॒भासु॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 28 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : गावः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों का क्या अवश्य कर्त्तव्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यू॒यम्। गा॒वः॒। मे॒द॒य॒थ॒। कृ॒शम्। चि॒त्। अ॒श्री॒रम्। चि॒त्। कृ॒णु॒थ॒। सु॒ऽप्रती॑कम्। भ॒द्रम्। गृ॒हम्। कृ॒णु॒थ॒। भ॒द्र॒ऽवा॒चः॒। बृ॒हत्। वः॒। वयः॑। उ॒च्य॒ते॒। स॒भासु॑ ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (यूयम्) आप लोग जो (गावः) वाणियाँ हैं उनको (मेदयथा) मधुर करिये (चित्) और (अश्रीरम्) अमङ्गलस्वरूप और अधर्माचरण करनेवाले को (कृशम्) क्षीण (कृणुथा) करिये और (चित्) भी (सुप्रतीकम्) उत्तम प्रतीति करानेवाले द्वार आदि जिसमें उस (भद्रम्) कल्याण करने शुद्ध वायु जल और वृक्षवाले (गृहम्) गृह को (कृणुथ) करिये और (सभासु) आप्त विद्वानों से प्रकाशमान सभाओं में (भद्रवाचः) जो कल्याण करनेवाली सत्यभाषण से युक्त वाणियाँ उनको स्वीकार करिये और जो (वः) आप लोगों का (बृहत्) बड़ा (वयः) जीवन (उच्यते) कहा जाता है, उसको करिये ॥६॥

भावार्थ : जो मनुष्य कोमल, सत्य, धर्मयुक्त वाणी तथा सर्व ऋतुओं में सुख करनेवाले घर को, सभा को और अधिक अवस्था को करते हैं, वे संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं ॥६॥