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Rigveda / 6 / 33 / 3

त्वं ताँ इ॑न्द्रो॒भयाँ॑ अ॒मित्रा॒न्दासा॑ वृ॒त्राण्यार्या॑ च शूर। वधी॒र्वने॑व॒ सुधि॑तेभि॒रत्कै॒रा पृ॒त्सु द॑र्षि नृ॒णां नृ॑तम ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 33 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : शुनहोत्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। तान्। इ॒न्द्र॒। उ॒भया॑न्। अ॒मित्रा॑न्। दासा॑। वृ॒त्राणि॑। आर्या॑। च॒। शू॒र॒। वधीः॑। वना॑ऽइव। सुऽधि॑तेभिः। अत्कैः॑। आ। पृ॒त्ऽसु। द॒र्षि॒। नृ॒णाम्। नृ॒ऽत॒म॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (नृणाम्) मुखियाजनों में (नृतम) अत्यन्त मुखिया (शूर) दुष्टों के नाशक (इन्द्र) राजन् ! (त्वम्) आप (तान्) उन (अमित्रान्) दुष्ट सब को पीड़ा देनेवाले और (आर्या) धर्मिष्ठ उत्तम जनों को (च) और (उभयान्) दो प्रकार के विभाग करके दुष्ट और पीड़ा देनेवालों का (पृत्सु) सङ्ग्रामों में (वनेव) अग्नि जैसे वनों का, वैसे (वधीः) नाश करिये और (सुधितेभिः) उत्तम प्रकार से तृप्त किये गये (अत्कैः) घोड़ों से (आ, दर्षि) विदीर्ण करते हो और धर्म्मिष्ठ उत्तम जनों की रक्षा करते हो तथा (दासा) देने योग्य (वृत्राणि) धनों को प्राप्त होते हो, इससे विवेकी हो ॥३॥

भावार्थ : जो राजा उत्तम, अनुत्तम, धार्मिक और अधार्मिकों का परीक्षा से विभाग करके उत्तमों की रक्षा करता और दुष्टों को दण्ड देता है, वही सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता है ॥३॥