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Rigveda / 6 / 37 / 2

प्रो द्रोणे॒ हर॑यः॒ कर्मा॑ग्मन्पुना॒नास॒ ऋज्य॑न्तो अभूवन्। इन्द्रो॑ नो अ॒स्य पू॒र्व्यः प॑पीयाद्द्यु॒क्षो मद॑स्य सो॒म्यस्य॒ राजा॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 37 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्य परस्पर कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्रो इति॑। द्रोणे॑। हर॑यः। कर्म॑। अ॒ग्म॒न्। पु॒ना॒नासः॑। ऋज्य॑न्तः। अ॒भू॒व॒न्। इन्द्रः॑। नः॒। अ॒स्य। पू॒र्व्यः। प॒पी॒या॒त्। द्यु॒क्षः। मद॑स्य। सो॒म्यस्य। राजा॑ ॥२॥

पदार्थ : जो (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाला (अस्य) इस (सोम्यस्य) ऐश्वर्य्य में हुए (मदस्य) आनन्द का (द्युक्षः) अन्तरिक्ष के सदृश भूमि जिसकी वह (पपीयात्) बढ़े और (पूर्व्यः) पूर्वजनों से उत्पन्न किया गया (नः) हम लोगों का (राजा) प्रकाशमान राजा होवे और जो (पुनानासः) पवित्र (ऋज्यन्तः) सरल के सदृश आचरण करते हुए (हरयः) मनुष्य (द्रोणे) परिमाण में (कर्म) कर्म्म को (प्रो) अच्छे प्रकार (अग्मन्) प्राप्त होते हैं और (अभूवन्) प्रसिद्ध होते हैं, वे अन्यों को भी पवित्र करते हैं ॥२॥

भावार्थ : जो राजा आदि श्रेष्ठ जन स्वयं पवित्र और श्रेष्ठ स्वभाववाले और सरल होकर श्रेष्ठ कर्म्मों को करके न्याय से हम लोगों की रक्षा करते हैं, वे हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ॥२॥