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Rigveda / 6 / 38 / 2

दू॒राच्चि॒दा व॑सतो अस्य॒ कर्णा॒ घोषा॒दिन्द्र॑स्य तन्यति ब्रुवा॒णः। एयमे॑नं दे॒वहू॑तिर्ववृत्यान्म॒द्र्य१॒॑गिन्द्र॑मि॒यमृ॒च्यमा॑ना ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 38 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या ग्रहण करके सेवा करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : दू॒रात्। चि॒त्। आ। व॒स॒तः॒। अ॒स्य॒। कर्णा॑। घोषा॑त्। इन्द्र॑स्य। त॒न्य॒ति॒। ब्रु॒वा॒णः। आ। इ॒यम्। ए॒न॒म्। दे॒वऽहू॑तिः। व॒वृ॒त्या॒त्। म॒द्र्य॑क्। इन्द्र॑म्। इ॒यम्। ऋ॒च्यमा॑ना ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिस (अस्य) इस (इन्द्रस्य) राजा के (दूरात्) दूर से (चित्) भी (वसतः) निवास करते हुए के (कर्णा) दोनों कान (घोषात्) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी से जो (आ, तन्यति) अच्छे प्रकार शब्दित करता है और जो (देवहूतिः) विद्वानों से प्रशंसा की गई (इयम्) यह वाणी (एनम्) इस (इन्द्रम्) ऐश्वर्य्य से युक्त विद्वान् को (आ) चारों ओर से (ववृत्यात्) वर्त्तित करे और (इयम्) यह (ऋच्यमाना) स्तुति की गई और जो (मद्र्यक्) मुझ सरीका (ब्रुवाणः) उपदेश करता हुआ उसको वर्त्ते, उसकी आप लोग सेवा करो ॥२॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जिसका आत्मा श्रोत्रों के द्वारा विद्या से तृप्त होवे और जिसको सम्पूर्ण विद्या से युक्त वाणी प्राप्त होवे, उसी का उत्तम प्रकार सेवन करके पूर्ण विद्या को प्राप्त हूजिये ॥२॥